ईद पर निबंध-Eid par nibandh

ईद पर बड़े व छोटे निबंध – Long & Short Essay on Eid

#1. Short Essay on Eid (ईद ) 500-600 Words

प्रस्तावना: भारत में त्योहारों का अपना अलग महत्व है। जैसे हिन्दुओं के लिए होली, दिवाली महत्वपूर्ण है , उसी तरह ईद मुसलमानो का त्यौहार है जिसे लोग उत्साह और आनंद के साथ मनाते है। सभी मुसलमान इस त्यौहार को बड़े आस्था के संग मनाते है। ईद के पहले लोगो का रमज़ान का महीना चलता है। ईद का त्यौहार एक दूसरे के सुख दुःख बांटने का पर्व है। रमज़ान के महीने में लोग रोज़ा रखते है। रोज़ा का अर्थ है सिर्फ रात में भोजन करना। मुसलमान लोग बड़े ख़ुशी और मन से रोज़ा रखते है।

ईद को ईद-उल -फितर कहा जाता है। ईद का मतलब है फिर से और फितर का अर्थ है खाना -पीना। ईद का इंतज़ार सभी लोग बेसब्री के साथ करते है। रमज़ान का पूरा महीना खत्म होने के बाद जिस दिन चाँद निकलता है , उस के बाद वाले दिन ईद मनाया जाता है। रमज़ान महीने के कठिन परिश्रम , बलिदान , आस्था और रोज़े के पश्चात ईद आता है। ईद का त्यौहार लोगो में प्रेम और भाईचारा फैलाता है। रमज़ान के महीने में हर मुसलमान अपने आत्मा का शुद्धिकरण करते है।

ईद के दिन लोग अपने परिवार वालो के साथ ख़ुशी ख़ुशी ईद मनाते है। इस दिन लोग नए नए कपड़े पहनते है। ईद के दिन से सभी लोग सुबह से खाना पीना शुरू कर देते है। सभी घरो में सेवइयां बनती है। कई तरह के मीठे पकवान बनाये जाते है।

ईद के दिन लोग नहाकर नए पोशाक पहनते है और मस्जिद में जाकर नमाज़ पढ़ते है। मस्जिद में सभी लोग मिलकर नमाज़ अदा करते है। नमाज़ अदा करने के बाद सभी लोग भेद भाव भूलकर एक दूसरे के गले लगते है। एक दूसरे के गले लगकर लोग ईद मुबारक कहते है। आज ईद के शुभ मौके पर हिन्दू लोग मुसलमान दोस्तों को ईद मुबारक कहते है। ईद प्रेम , दोस्ती और भाईचारे का पैगाम देती है।

संसार में सभी लोग चाहे वह गरीब हो या धनवान मिल जुलकर ईद मनाते है। हर घरो में मीठे पकवान बनते है। लोग अपने मित्रो और रिश्तेदारों को मिठाईयां खिलाते है और खुशियां बांटते है। कई दुकानों में सेवईयां ईद के पहले बनाई जाती है।

रोज़ा में लोग दिन में कुछ नहीं खाते -पीते है। ईद में सूर्य डूबने के बाद और सूर्योदय होने से पहले खाया जाता है। इसमें बहुत धैर्य की आवश्यकता होती है। एक महीने का व्रत रखना धैर्य का काम होता है। ईद में बच्चो और व्यस्क लोगो को व्रत रखना अनिवार्य नहीं है। जब बच्चे बड़े हो जाते है , तब वह उपवास यानी रोज़ा रख सकते है। रमज़ान का महीना बड़ा ही पवित्र माना जाता है। लोगो में भरपूर उत्साह रहता है कि ईद कब आएगा ।

जैसे आसमान में ईद का चाँद निकलता है , ईद की तैयारियां आरम्भ हो जाती है। ईद में कई जगहों पर मेला लगता है। बच्चे ईद में बेहद खुश रहते है और मेले में उनके खुशियों का कोई ठिकाना नहीं रहता है। लोग अपने पसंद की चीज़ें मेले से खरीदते है। बच्चो को गुब्बारे और खिलौने मेले में बहुत अच्छे लगते है।

ईद के पावन अवसर पर सामाजिक मेल मिलाप होता है। चारो तरफ उत्साह और खुशियों का माहौल छाया रहता है। ईद के समय बाजार भी खूबसूरत तरीके से सज जाते है। लोग एक दूसरे के घरो में ईद के दावत में शरीख होते है। गरीब हो या अमीर सभी लोग दिल से ईद मनाते है।

ईद के दिन कोई दुखी और परेशान नहीं रहता है। अगर कोई दर्द और परेशानी में है तो कुरान कहता है , उसकी सहायता करनी चाहिए। यह उत्सव हमे सिखाता है कि यदि कोई ज़रूरतमंद हो या लाचार हो उसकी मदद करनी चाहिए।

निष्कर्ष:

हमारे देश में हर उत्सव का अपना रंग और अपना अलग परिचय होता है। ईद भी एक ऐसा ही त्यौहार है जहां लोग अपना दुःख दर्द , गिले-शिकवे भूलकर सम्पूर्ण हर्ष और उल्लास के साथ यह पर्व मनाते है। ईद के दिन लोग एक दूसरे के घर जाते है और मज़ेदार पकवानो का लुफ्त उठाते है। लोग सब कुछ भूलकर भाईचारे की भावना से यह पर्व मनाते है जो सभी को एक दूसरे के संग जोड़कर रखता है।

Eid-mubarak, ईद मुबारक
EID MUBARAK

#2. [Long Essay] ईद पर निबंध-Eid par nibandh

प्रस्तावना:- हमारे देश भारत में प्रत्येक समाज के अपने अलग-अलग त्योहार होते हैं और उनका महत्व भी उनके लिए बहुत ही बहुत होता है प्रत्येक व्यक्ति अपनी खुशी के लिए सब के साथ मिलकर त्योहार मनाते हैं। ये त्योहार रोज के जीवन से अलग होता है । उसे हम एक बहुत खास दिन मानते हैं । उन्ही त्योहारों में से एक है ।ईद जिसे सभी मुसलमान भाई मिलकर मनाते हैं इसे ईद-उल-फितर के नाम से भी जाना जाता है और ईद-उल-अजहा के नाम से भी जाना जाता है। ईद मान्य भाषा मे मीठी ईद ओर बकरा ईद। इस प्रकार ईद का अपना एक महत्व है।

‘ईद का चांद’ जैसे मुहावरे का सम्बन्ध ईद के त्योहार से ही है। क्योंकि ईद की गणना और आगमन चन्द्रमा के उदय होने पर ही निर्भर होता है। यह त्यौहार मुस्लिम भाइयों का एकमात्र ऐसा त्योहार है जिस दिन वे सबसे अधिक प्रसन्न रहते हैं। इसीलिए ‘ईद’ शब्द प्रसन्नता का द्योतक है। यह प्रसन्नता, सुन्दरता तथा पारस्परिक मधुर-मिलन के भाव को प्रकट करने वाला त्योहार है।

ईद का त्योहार प्रतिवर्ष एक बार नहीं, बल्कि दो बार आता है। पहले यह फाल्गुन (फरवरी-मार्च) महीने में आता है, तब इसे ‘ईद-उल-फितर‘ नाम से पुकारते हैं। दूसरी बार यह त्योहार ज्येष्ठ (मई) मास में आता है, तब से ‘ईद-उल-जुहा’ नाम दिया जाता है परन्तु यह सर्वथा निश्चित नहीं है कि यह त्योहार प्रतिवर्ष इन्हीं महीनों में आए क्योंकि इसमें तिथि। की गणना हिज़ी कैलेंडर के हिसाब से तथा चांद के उदय होने के साथ घटती-बढ़ती है। कई बार तो यह त्योहार अलग-अलग स्थान पर अलग-अलग दिनों में मनाया जाता है।

इन दो ईदों में से एक ‘शाकाहारी ढंग से मनाई जाती है तो दूसरी ‘मांसाहारी’ ढंग से। शाकाहारी ईद को ईद या मीठी ईद (ईद-उल-मिलाद) नाम दिया जाता है। इस दिन सिवइयाँ व मिठाइयां आदि खाने-खिलाने की परम्परा है। मांसाहारी ईद को ‘बकरीद’ नाम दिया जाता है। इस दिन बकरे हलाल कर उनका मांस एक तरह से शिरनी या प्रसाद के रूप में बांट कर खाने-खिलाने की परम्परा है।

ईद से पहले रमजान का पवित्र महीना हुआ करता है। रमजान के महीने में धार्मिक प्रवृत्ति वाले मुसलमान लोग सूर्योदय से पूर्व कुछ खा-पीकर दिनभर रोजा (व्रत) रखा करते हैं। पूर्णतया पाक-साफ रह कर दिन में पांच बार नमाज अदा करते हैं तथा सायंकाल में सूर्यास्त के बाद दान-पुण्य करके तथा निर्धनों आदि को भोजन खिलाकर तथा बाद में स्वयं खाकर रोजे (व्रत) को समाप्त करते हैं। ईद के दिन बच्चे, बूढ़े, स्त्री-पुरुष सभी प्रसन्नचित्त दिखाई पड़ते हैं। ये सभी मेलों में जाकर अपनी आवश्यकतानुसार खरीददारी करते हैं। सभी जन आपस में एक-दूसरे से प्रेमपूर्वक मिलते हैं तथा एक-दूसरे को बधाइयां देते हैं।

ईद की शुरुआत हुई:– ईद या ईद उल- 624 ईसवी से मनाया जाता रहा है ।पैगंबर हजरत मोहम्मद ने बद्र के युद्ध में विजय प्राप्त की थी ।यह त्योहार उसी खुशी में मनाया जाता है।

ईद का अर्थ: ईद का अर्थ होता है ।जश्न मनाना, या त्योहार मनाना।

ईद कितने प्रकार की होती है: ईद दो प्रकार की होती हैं।

(1) मीठी ईद, (2)बकरा ईद

मीठी ईद:- मीठी ईद में मीठे पकवान बनाए जाते हैं ।जिसमें सिवइयां इत्यादि होते है। अपने से छोटों को ईदी देने की भी परंपरा है ।दान देकर अल्लाह को याद किया जाता है।इस दान को इस्लाम में फितरा कहा जाता है ।इसलिए ईद को ईद – उल – फितर कहा जाता है ।इसमें सभी आपस में गले मिलकर एक दूसरे को ईद की शुभकामनाएं देते हैं ।

और अल्लाह से सुख और शांति ओर बरकत के लिए दुआ मांगते है। मीठी ईद में 29 व 30 वे रमजान के इफ्तार के लगभग 5 से 6 मिनटो के लिए चांद निकलता है ।अगर मौसम साफ रहा तो आसानी से चांद को देखा जा सकता है ।इस्लाम में अपनी आंखों से चांद को देखना अच्छा माना जाता है।

बकरीद ईद:- बकरीद ईद को ईद -उल – अजहा के नाम से जाना जाता है । मीठी ईद जहां मिठास भरी होती है ।वही बकरी ईद मीठी ईद के 2 महीने बाद मनाई जाती है ।मुस्लिम समाज में मीठी ईद के बाद दूसरा सबसे बड़ा त्योहार है । बकरा ईद के दिन सबसे पहले नमाज अदा की जाती है। उसके बाद बकरे या अन्य जानवर की कुर्बानी दी जाती है ।कुर्बानी के बकरे के तीन हिस्से किये जाते है। इसका एक हिस्सा गरीबों को, दूसरे दोस्त अहबाब के लिए , ओर तीसरा हिस्सा घर मे इस्तमाल
किया जाता है।

बकरीद को मनाने की कहानी:- मान्यता है कि एक पैगंबर हजरत इब्राहिम के 90 साल की उम्र तक कोई औलाद नहीं थी ।उन्होंने खुदा से बहुत इबादत की तब जाकर उनका इस्माइल नाम के बेटे ने जन्म दिया ।वह बहुत खुश हुए फिर दिन उन्हें एक सपना आया है जिसमें कुर्बानी की बात कही गई तो उन्होंने ऊंट की कुर्बानी दे दी।पर उन्हें फिर एक सपना आया और उसमें सबसे प्यारी चीज की कुर्बानी देने की बात कही गई तो इब्राहिम ने सारे जानवरों की कुर्बानी देदी।

उन्हें फिर वापिस सपना आया इस बार उन्होंने खुदा का आदेश मानते हुए अपने बेटे की कुर्बानी के बारे में सोचा और उन्होंने अपनी पत्नी को बच्चे को नहला कर तैयार करने को कहा बेटे को लेकर जब हजरत इब्राहीम बलि वाले स्थान पर जाने लगे तब उन्हें शैतान ने कुर्बानी देने से मना किया।जब ये बात शैतान बार- बार कहने लगा तो इब्राहिम ने अपनी आँखों पर पट्टी बांधकर बलि देने का फैसला लिया ओर बलि देदी लेकिन जब पट्टी खोलकर देखा तो बच्चा तो खेलकूद रहा और अल्लाह ने बच्चे की जगह बकरे को बदल दिया था ।

इस प्रकार बली का प्रचलन शुरू हुआ ।वह हमेशा बुराई के खिलाफ लड़े और उनका ज्यादातर जीवन जन सेवा में ही बीता इस प्रकार व जन सेवा के लिए हमेशा तत्पर रहते थे।

ईद कब मनाई जाती है: ईद का त्योहार इस्लामी माह शकवाल की पहली तारीख को मनाया जाता है ।जिसे मुसलमान लोग बहुत ही पवित्र महीना मानते हैं इस माह में रोजे (उपवास )रखे जाते हैं सूर्योदय से सूर्यास्त तक कुछ भी नहीं खाते हैं सूर्यास्त के पश्चात रोजा खोला जाता है ।जिसे रोजा इफ्तारी कहा जाता है ।दिनभर कुरान शरीफ का पाठ करा जाता है रोजे रखने वाले व्यक्ति के द्वारा और नियम अनुसार नमाज अदा की जाती है पूरे महीना रोजा चलता है और व्यक्ति सच्चे मन और पूरे उत्साह से रोजा रखता है और उसका पालन करता है।

उपसंहार

मीठी ईद मिठास लाएं.
बकरीद ईद खुशियां लाएं
ना हो भेदभाव ना कोई हो लड़ाई.
इस प्यारी सी सौगात को मिलकर हम सब चलो ईद मनाए.

इस प्रकार ईद में रमजान के महीने में लोगों द्वारा रखे हुए रोजे से उनके मन मे विश्वास उत्पन्न होता है कि रोज़े से उनकी आत्मा पवित्र होती है ।और उन्हें बुरे कर्मों और नर्क से मुक्ति मिलती है ।यह त्योहार भेदभाव को भुलाकर मिलजुल कर मनाने की प्रेरणा देता है । ईद में हम सभी को राग द्वेष भुलाकर भाईचारे की भावना रखते हुए मनाना चाहिए ।क्योंकि त्योहार स्फूर्ति ओर ताजगी और खुशियों के साथ मनाने की प्रबल शक्ति देता है।ईस में जात पात की भावना को मिटाने की प्रेरणा देता है । इस प्रकार यह त्योहार आकर प्रसन्नता, समानता, भाईचारे व निःस्वार्थ मेल-मिलाप का सन्देश दे जाया करता है। इससे इस्लामिक जीवन-पद्धति एवं संस्कृति की एक झलक मिल जाती है।

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