आलस्य मनुष्य का शत्रु: निबंध, अनुछेद, लेख

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आलस्य मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु: आलश्य एक ऐसा भाव है जो मनुष्य को कार्य करने की इज़ाज़त नहीं देता अर्थात मनुष्य कोई भी काम नहीं करना चाहता। उसे कोई भी कार्य करना अच्छा नहीं लगता शिवाय आराम फरमाने के। आलस मनुष्य को दुर्गम मार्ग पर ले जाता है। आलसी मनुष्य को अपने कुर्शी से उठने में भी कठिनाई होती है। उसे लगता है की उसका काम कोई दूसरा व्यक्ति कर दे तो उसकी नींद पूरी हो जाए। अब बताइये आलसी मनुष्य अपना दुश्मन खुद ही बन जाता है। उसे परिश्रम का महत्व समझ नहीं आता।

मनुष्य में कई तरह के दोष है जैसे, लालच, क्रोध, हिंसा, जलन आदि लेकिन सबसे भयानक आलस का रोग है। आलस मनुष्य को असफलता के राह पर ले जाता है। असफलता, अवनति और विनाश आलसी मनुष्य के परिणाम है। शेर भी जंगल में शिकार करके अपनी भूख मिटाता है। शेर जंगल का राजा होता है लेकिन वह भी परिश्रम करके जानवर का शिकार करता है। कहने का तात्पर्य है बिना कोई काम किये किसी को जीवन में लक्ष्य प्राप्ति नहीं होती।

सफलता पाने के लिए आलस्य को त्यागना आवश्यक: मेहनत करने से कभी पीछे नहीं हटना चाहिए। एक छोटा सा बच्चा भी 1 साल के बाद मेहनत से चलने की कोशिश करता है चाहें वह कितनी बार भी गिर जाए वह हार नहीं मानता लेकिन आलसी इंसान की बात ही कुछ और है। आलसी मनुष्य भाग्य के सहारे जीता है। मेहनत पर उसे विश्वास नहीं है। कोई भी या किसी भी परिश्थिति में इंसान को भाग्य के भरोसे नहीं रहना चाहिए।

नसीब कब अंगूठा दिखाकर चली जाए पता नहीं चलता। ईश्वर ने हमें सही सलामत बनाया है हमें इसका उपयोग करने की आवशयकता है। इतनी खुबशुरत ज़िन्दगी में आलसी लोग बैठे और सोये हुए अपना गुज़ारा करते है। सुबह उठने में आलस, कोई छोटा मोटा कार्य करने में आलस, टेबल पर मोबाइल पड़ा हुआ है उसे लेने में आलस। आलसी व्यक्ति को हर जगह धक्के खाने पड़ते है और कटु वचन सुनने को प्राप्त होता है लेकिन कोई असर हो तब न।

आज कल लोग इतने आलसी हो गए है की उन्हें अपने छोटे -छोटे काम करने के लिए नौकर की ज़रूरत होती है। समय के अभाव में लोगो को सही में वक़्त नहीं मिलता लेकिन कुछ लोग वक़्त होते हुए भी अपना आलसीपन दिखाने में बाज़ नहीं आते। आलसी इंसान को यह लगता है उन्हें उतना ही मिलेगा जितना भाग्य में लिखा होगा। इतना मेहनत करके चाँद तारे थोड़े ही न तोड़ लाएंगे। यह एक तरह की नकारात्मक मानशिकता है जो इंसान को काम करने से पीछे खींचती है। आलसी लोगों की बुरी संगती में अच्छे खासे लोग आलसी बन जाते है।

आलसी लोगों को कितना भी समझाया जाए वह परिश्रम के महत्व को जानने और समझने की सोच तक नहीं रखते। आलसी लोग शीघ्र ही रोग ग्रस्त हो जाते है। बिना कोई काम किये उनका खाली दिमाग शैतान का घर में परिवर्तित हो जाता है। जो लोग परिश्रमी होते है वह मेहनत करने में कभी भी पीछे नहीं हटते। जितनी असफलता मिले उन्हें स्वीकार कर ज़िन्दगी में और अधिक मेहनत करते है।

मेहनत का फल मीठा होता है: असफलता सफलता का दूसरा चेहरा होता है। इससे हम अपने काम को और ज़्यादा बेहतर बनाते है। आलसी लोगों को यह समझ कहाँ, वह अपनी नाकामयाबी और असफलता दूसरों के सर मढ़ देते है।

भाग्य का सहारा लेने वाले आलसी लोगों को मुर्ख, कामचोर और डरपोक कहा जाता है। आलसी मनुष्य जल्दी ही रोग ग्रस्त हो जाते है। समाज में एक मज़ाक बनकर रह जाते है। कोई भी व्यक्ति आलसी मनुष्य की इज़्ज़त नहीं करता, आलसी मनुष्य को मानसिक बीमारियां होने की सम्भावना होती है। ज़िन्दगी में ऐसा कोई कार्य नहीं जो मेहनत के बल बूते न हो। आलश्य जैसी मनोवृति अपने मन में आने नहीं देना चाहिए। स्वयंग की इन्द्रियों पर नियंत्रण रखना ज़रूरी होता है। धैर्य, मेहनत, हिम्मत, दृढ़ संकल्प जैसे गुण मनुष्य को एक सकारात्मक जीवन की ओर आहवाहन करता है।

आलस्य का त्याग: विद्यार्थी जीवन में परिश्रम का महत्व पाठ में पढ़ाया जाता है। परिश्रमी विद्यार्थी प्रतिशत की चिंता नहीं करते। वह हमेशा मेहनत करने को प्राथमिकता देते है। असफल होने पर भी परिश्रम करने का दामन नहीं छोड़ते है। यह एक सच्चे विद्यार्थी की पहचान है। कोई भी क्षेत्र हो वह परिश्रम करके अपनी पहचान बनाते है। सच्चा इंसान उसे ही कहा जाता है। मेहनत का फल मीठा हो या कड़वा उससे फर्क नहीं पड़ता। मेहनती लोग परिश्रम से मित्रता कर लेते है। रात -रात जागकर अपना काम पूरा करते है। उन्हें अपनी या अपनी सेहत की कोई चिंता नहीं होती बस मेहनत को संग लेकर जीवन के कठिन से कठिन चुनौतियों को पार कर लेते है।

आलसी व्यक्ति का न वर्तमान होता है और न ही भविष्य। इसलिए कहा जाता है

“आलस्यं हि मनुष्याणां सरीरस्थो महान रिपु :
नास्त्युडयम बंधु: कृत्वा यं नवसीदति “

कहने का तात्पर्य है की मनुष्य के शरीर में रहने वाला आलस्य ही सबसे बड़ा दुश्मन है। आलस्य से बड़ा अभिशाप कोई दूजा नहीं है। परिश्रम करके मनुष्य को जो ख़ुशी मिलती है उसे बताया नहीं जा सकता। परिश्रम से मित्रता कर लेनी चाहिए। इंसान अंतत; उदास नहीं होता। आलसी मनुष्य आज का काम कल पर छोड़ देता है। रोज -रोज के बहाने बनता है, इसलिए कबीर जी ने कहा है:

“काल करै सो आज कर, आज करै सो अब.
पल में प्रलय होइगी ,बहुरि करैगो कब “

अर्थ है की आज का काम कल पर नहीं छोड़ना चाहिए और आज ही अवश्य उसे पूरा करना चाहिए। आज का काम कल पड़ छोड़ेंगे तो कल का काम कब पूरा करेंगे।

निष्कर्ष:

आलसी व्यक्ति को समय का सदुपयोग भी करना नहीं आता। समय का उपहास करना इंसान पे भीषण भारी पढता है। आलसी व्यक्ति हमेशा निराश, हतास और उदास रहता है। उसे दुसरो पर अपने काम को करवाने के लिए निर्भर रहना पढता है जो निश्चित रूप से निंदनीय है। जीवन के कठिन से कठिन मार्ग पर इंसान को मेहनत और धैर्य से काम लेना होगा। महाभारत में कहा गया था की “कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन” अर्थात हमे अपने कर्म करने चाहिए,फल की चिंता नहीं। कर्म करने के लिए सच्ची नियत, मेहनत और लगन की आवश्यकता होती है। आलस्य के मार्ग पर घोर अंधकार है। आलसी लोगो को जल्द आलस्य से मुक्ति पाकर परिश्रम करने के मार्ग पर चलना होगा।

अनुछेद लेख : आलस्य मनुष्य का शत्रु | Anuched Writing on Alasya

आलस्य एक ऐसा भाव है जो मनुष्य को कार्य करने की इज़ाज़त नहीं देता, अर्थात मनुष्य कोई भी काम नहीं करना चाहता है। इस गुण के कारण मनुष्य आरामभावी बन जाता है और सफलता के मार्ग में उसका प्रगति सम्भव नहीं होता। आलस्य मनुष्य को दुर्गम मार्ग पर ले जाता है जहां उसे असफलता, अवनति और विनाश का सामना करना पड़ता है। यह एक बुरी मनोवृत्ति है जो इंसान के विकास और समृद्धि की राह में बड़ी बाधा है।

आलस्य एक मनुष्य को अपने संघर्ष और परिश्रम के बल पर आगे बढ़ने से रोकता है। यह एक ऐसा दुश्मन है जो अपने स्वयं के सफलता के मार्ग में खड़ी चुनौतियों से घबरा देता है। आलस्यी मनुष्य को अपनी कमजोरियों के बारे में जागरूक नहीं होने देता जिससे वह उनसे बचने और उन्हें पार करने के लिए समर्थ नहीं होता।

आलस्य मनुष्य को अपने कुर्शी से उठने में भी कठिनाई होती है। उसे लगता है कि उसका काम कोई दूसरा व्यक्ति कर दे तो उसकी नींद पूरी हो जाएगी। वास्तव में, आलसी व्यक्ति अपने आप को खो देता है और अपने जीवन को खाली-दिमागी शैतान का घर बना लेता है। वह कभी भी परिश्रम करने की इच्छा नहीं रखता, जिससे उसका बुद्धि के विकास में विघ्न उत्पन्न होता है।

आलसी मनुष्य को उत्साह की कमी होती है और उसे अपने काम में लगन का एहसास नहीं होता। उसे विश्वास भी नहीं होता कि परिश्रम से वह अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है। इस गुण के वशीभूत होकर आलसी व्यक्ति भाग्य का सहारा लेने लगता है और मेहनत की प्राथमिकता को नजरअंदाज़ कर देता है। इस वजह से वह अपनी क्षमताओं को समझने में अक्षम होता है और अपने जीवन को अवसरों से वंचित रह जाता है।

आलस्य व्यक्ति को अनुशासन का पालन नहीं करने की आदत होती है। वह बार-बार अपनी कमजोरियों का दोहन करता है और अपने सामाजिक संबंधों को भी उत्साहपूर्वक नहीं बनाता। इससे उसे सभी द्वारा आदर्श बनाए गए नियमों और मानकों का पालन करने में कठिनाई होती है जिससे उसके व्यक्तित्व में कमी आती है।

आलस्य एक बुरी आदत है जो मनुष्य के विकास और समृद्धि को रोकती है। इसे दूर करने के लिए मनुष्य को स्वयं के प्रति जागरूक होने और परिश्रम के मार्ग पर चलने की जरूरत होती है। आलस्य का परिणामस्वरूप मनुष्य की सफलता के मार्ग में बाधा होती है और उसकी उच्चता और उत्कृष्टता को रोक देती है।

निष्कर्ष:
निष्कर्ष यह है कि आलस्य मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है जो उसे अपने लक्ष्यों और सपनों की प्राप्ति में रोकता है। यह एक दुश्मन है जो उसकी सफलता के मार्ग में बड़ी बाधा है। आलस्यी मनुष्य को अपने कामों में लगन की भावना नहीं होती है और वह अपने संघर्षों से घबरा जाता है। उसे अपने स्वयं की कमजोरियों के सामने आँखें बंद कर देने की आदत होती है, जिससे उसकी सफलता के मार्ग में विघ्न उत्पन्न होता है।

व्यक्ति को आलस्य से मुक्ति पाने के लिए परिश्रम के मार्ग पर चलना अनिवार्य है। अपने कर्मों में लगन और उत्साह के साथ काम करने से ही उसे अपने लक्ष्य की प्राप्ति होती है। सफलता पाने के लिए आलस्य को त्यागना आवश्यक है।

इसके अलावा, व्यक्ति को समय का सदुपयोग करना और विशेष रूप से परिश्रम करने में लगन रखना जरूरी है। वह अपने कार्यों को धैर्य से और निष्ठा से पूरा करना चाहिए ताकि उसकी मेहनत का फल मीठा हो। इससे उसका आत्मविश्वास बढ़ेगा और उसे सफलता की ओर एक नई ऊंचाइयों की राह दिखाई देगी।

आलस्यी मनुष्य द्वारा अनुशासन का पालन और नियमों का पालन भी ज़रूरी है। वह अपनी कमियों को स्वीकारने के साथ ही उन्हें दूर करने के लिए सक्रिय रूप से प्रयास करना चाहिए। समय की कद्र करना, सक्रिय भूमिका निभाना, और सही लक्ष्य प्राप्ति के लिए कड़ी मेहनत करना उसकी सफलता के मार्ग में महत्वपूर्ण होता है।

आलस्य पर 10 लाइन | Alasya par 10 Lines

  1. आलस्य मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु है।
  2. आलस्य अविश्वसनीय रूप से कार्य करने को नहीं प्रेरित करता है।
  3. आलसी व्यक्ति को अपने संबंधित कार्यों में कठिनाई होती है।
  4. आलसी मनुष्य अपने काम को दूसरों को सौंपने के इच्छुक होता है।
  5. आलसी मनुष्य अपने सामर्थ्य को नहीं समझता और उसे नकारात्मक मानसिकता प्रदान करता है।
  6. सफलता पाने के लिए आलस्य को त्यागना आवश्यक है।
  7. आलसी लोग बार-बार अपनी नाकामयाबियों के शिकार होते हैं।
  8. मेहनत का फल मीठा होता है और परिश्रमी व्यक्ति जीवन में सफलता प्राप्त करता है।
  9. कर्मयोग के अनुसार, काम करने का अधिकार आपका है, लेकिन फल की चिंता नहीं करनी चाहिए।
  10. आलसी मनुष्य को सकारात्मक सोच और निरंतर परिश्रम की आवश्यकता है ताकि वह अपने दुश्मन न बने और सफलता के मार्ग पर चल सके।

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1 thought on “आलस्य मनुष्य का शत्रु: निबंध, अनुछेद, लेख”

  1. आलसी लोगों को सफल होनों के लिए बहत कठिनाइया होती है क्योंकि वह किसी भी कार्य को करने मे आलस करता है।

    हमें आलस नही करना चाहिए

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