गरीबी एक अभिशाप पर निबंध

गरीबी एक अभिशाप पर निबंध
[Essay on poverty a curse ]

प्रस्तावना:- सुप्रसिद्ध नाटककार श्री मोहन राकेश ने अपने सुप्रसिद्ध नाटक आषाढ़ का एक दिन में गरीबी का सही और मर्मस्पर्शी चित्र खिंचते हुए कहा है।

दारिद्र्य वह कलंक है, जो छिपाए नहीं छिपता,… केवल छिपता ही नही, लाख-लाख गुणों को ढक देता है।” 

इस तरह दरिद्रता अर्थात गरीबी वास्तव में अत्यंत कष्टकारी और दुखकारी होती है। इसे गोस्वामी तुलसीदास ने अत्यंत गम्भीरता पूर्वक अपनी महाकाव्यकृति “रामचरितमानस” में यो कहा है।

“नहीं दरिद्र सम दुख जग माही।

संत मिलन सम सुख कछु नहीं।“

गरीबी के प्रभाव:- गरीबी को प्रायः सभी महामानवों ने न केवल गंभीरता पूर्वक समझा और समझाने का प्रयास किया है। अपितु इसे बहुत बड़ा पाप और अपराध भी कहा है। ऐसा इसलिए कि इससे अनेक प्रकार के कष्ट, दुःख और अभाव आ घेरते है। उनसे जीवन-विकास की गति ही धीमी नही पड़ती है, अपितु सामान्य और छोटी-छोटी आवश्यकताए धक्के खा-खाकर घिस-पिट जाती है। फलतः जीवन असहाय और सर्वथा उपेक्षित और घृणा का पात्र बनकर अलग-थलग पड़ जाता है। इस प्रकार गरीब व्यक्ति अपनी सभी प्रकार की आवश्यकतओ की पूर्ति करने की बात सोचने की हिम्मत नहीं जुटा पाता है। यह इसलिय की वह अपनी सामान्य शारिरिक आवश्यकताओ को पूरा करने के लिए निरंतर  जी तोड़ कोशिश करने के सिवाय और किसी आवश्यकता के लिए वह स्वम् को सक्षम और योग्य नहीँ  सिद्ध कर पाता है। इस प्रकार वह अपने विकास की पहली मंजिल पर चढ़ने में असमर्थ होकर रह जाता है। इस तरह वह अपने जीवन का न सच्चा आनंद ले पाता और ना इसके लिए योग्य बन पाता है। इस आधार पर कहा जा सकता है कि गरीबी का प्रभाव बड़ा ही भयानक और ह्रदयविदारक होता है। इससे स्वाभिमान, स्वाधिकार, प्रेम, सदभाव, साहचर्य, साहस, आशा, विशवास आदि मानवीय गुणों का न विकास होता है। कॉर्बन इसकी कोई कहि सम्भावना ही रह जाती है।

गरीबी के प्रभाव को प्रयोगवादी कवि श्री केदारनाथ अग्रवाल ने “पैतृक सम्पति” नामक कविता में बड़े ही ह्रदयस्पर्शी रूप में किया है।

जब बाप मरा तब यह पाया

भूखे किसान के बेटे ने

घर का मलवा, टूटी खटिया,

कुछ हाथ भूमि-वह भी परती

बस यही नहीं, जो भूख मिली

सौ गुनी बाप से अधिक मिली।

अब पेट खिलाये फिरता है।

चोडॉ मुँह बाए फिरता है

वह क्या जाने आज़ादी क्या?

आजाद देश की बाते क्या?

इस तरह गरीबी प्रभाव बहुत ही भयंकर और असहाय होता है। इससे न केवल शारिरिक कष्ट ही प्राप्त होते है। अपितु इससे मानसिक और हार्दिक भी अपार कष्ट होते है। उनमें सभी प्रकार की श्रेष्ठ भावनाएं नैतिकता, सरलता, सरसता, सत्यता आदि कुंठित होकर समाप्त हो जाती है। वे सभी पेट की आग में भस्म हो जाती है।

गरीबी के स्वरूप:- गरीबी के प्रभाव बड़े ही दुख और कष्टदायक होने के कारण इसके स्वरूप भी बहुत विद्रूप और अशोभनीय होते है। इससे घृणा, घिनोनेपन और अश्पृश्यता के स्वरूप और भाव स्पष्ठ रूप से प्रकट होते है। फलतः गरीबी व्यक्ति एक बहुत बड़ी अभिशायमयी जिंदगी जीने के लिए विवश हो जाता है।

गरीबी का सबसे बड़ा स्वरूप है:- असन्तोष गरीबी के पास आत्म-सुख और आत्म कल्याण के लिए जब कुछ शेष नहीं रह जाता है। तो वह अत्यंत उत्तेजीत ओर अस्यामित हो उठता है। फिर वह अपना पूरा विवेक खो डालता है। उसे दूसरों की सम्पति सुख सुविधा आदि छीनने या अपनाने के सिवाय और कोई चारा दिखाई नही देता है। इस प्रयास में यह अत्यंत अनैतिक और अशोभनीय कार्यो को करने लगता है। उसके सभी कार्य दुष्कर्मपूर्ण होते है। इनसे उसका स्वरूप बड़ा ही धुंधला, मेला और कलंकित दिखाई पड़ता है। फलतः वह कहि भी किसी प्रकार से समाहित और ग्रहा न होकर बड़ा उपेक्षित और त्याज्य बन जाता है। इस आधार पर यह कहा जा सकता है। कि गरीबी के स्वरूप बड़े ही अमानवीय और अनापेक्षित स्वरुप है। जो मानवता के लिए घोर कलंकित सिद्ध होते है।

गरीबी के कारण:- गरीबी के कारण एक नही अनेक है। भाग्यवादी होना गरीबी का एक प्रमुख कारण है। इससे व्यक्ति निठल्ला और अकर्मण्य बनकर भाग्य पर ही कवक भरोसा करता है। फलतः वह कोई भी कार्य करना उसके लिए बहुत दूर की बात है। किसी काम की शुरुआत भी नही कर पाता है। इस तरह कोई कार्य नही होगा, तो उसका फल भी कुछ नही होंगा। इस तरह कहि से भी कुछ भी प्राप्त होने की कोई गुंजाइश नहीँ होती है।

गरीबी का दूसरा प्रमुख कारण है: अंध-विशवास। इसे हमारे देश मे बड़ा महत्व दिया गया है। संतो ने स्पष्ट रूप से अर्कमण्यता और अंध-विशवास की सराहना करते हुए कहा है।

“अजगर करे ना चाकरी, पँछी करें न काम।

दास मलूका कह के गए,सबके दाता राम।।”

उपयुर्क्त सूक्ति पर अंध-विशवास करके हमारे देश के अधिकांश लोग भाग्यवादी और अंध-विशवासी है। फलतः वे आजीवन अपने बल और विवेक को प्रयोग में न लाकर गरीबी के दास बनने में ही अपनी बुद्धिमानी समझते है। गरीबी का तीसरा प्रमुख कारण है। आर्थिक-विषमता, हमारे देश मे आर्थिक विषमता इतनी ऊँची है कि एक ओर टाटा, बिरला, अम्बानी, मोदी आदि महान उधोगपति है। तो दुसरी और भूख से बिलबिलाते बच्चे और कुत्तो से भी गिरे हुए कंगालों की दुनिया है। इस तरह गरीबी के कारण एक नही अनेक है। ये सभी विकट ओर असाध्य है।

उपसंहार:- सचमुच में गरीबी मानवता का घोर कलंक है। यह मानवता को पशुता की और ले जाने वाली बहुत बड़ी अदृश्य शक्ति है। इसे दूर करने के उपाय समाज और शासन-सरकार दोनों को ही करना चाहिए। यह तभी सम्भव है। जब गरीबी अपनी पुरानी मान्यताओं  धारणाओं की खोल से बाहर निकले उसके लिए सरकार के सहयोग की बहुत बड़ी आवश्यकता है। गरीबो के लिए सहायतार्थ योजना के द्वारा धन सुविधा देकर सरकार को कदम बढ़ाना चाहिए।

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