भारतीय किसान की आत्मकथा पर निबंध

निबंध – “भारतीय किसान की आत्मकथा”

हिंदुस्तान में किसान को अन्नदाता कहा जाता है, भारत की अर्थव्यवस्था का एक बहुत बड़ा भाग कृषि पर निर्भर करता है, एक किसान की आत्मकथा का वर्णन मैं स्वरचित कुछ पंक्तियों द्वारा करना चाहूंगी, जो इस प्रकार हैं:

हाँ मैं किसान हूँ ये मेरी आत्मकथा है (२)
रोज़ सुबह उठकर जब खेतो में जाता हूँ, दिन भर की मेहनत कर जब लौट घर को आता हूँ मैं
हर रात रहता इंतज़ार अगली सुबह का, क्यूंकि उन बीजो में जीवन जो डाल आता हूँ मैं
लहलहाती है जब फसल खेतो मे यह देख आनंदित हो जाता हूँ मैं
हाँ मैं किसान हूँ ये मेरी आत्मकथा है (२)
गरीबी से है जंग मेरी, प्रकृति से है द्वन्द् मेरी, दो वक़्त् कि रोटी के लिए संघर्ष किये जाता हूँ मैं
हाँ मैं किसान हूँ ये मेरी आत्मकथा है (२)
कहते हैं निर्भर है अर्थव्यवस्था मुझपे, फिर भी क्यों खुद को ख़त्म किये जाता हूँ मैं
हाँ मैं किसान हूँ ये मेरी आत्मकथा है (२)

वर्त्तमान परिस्थिति में ये पंक्तियाँ अक्षरशः सत्य प्रतीत होती हैं , हमारा देश आज विकसित देशो की प्रतिस्पर्धा में शामिल हो तो गया है और ये गर्व की भी बात है , परन्तु देश के किसानो की दशा आज भी शोचनीय है| ऐसा नहीं है की सरकारे कुछ नहीं कर रही, ऐसी बहुत सी योजनाए है जिससे किसान लाभान्वित भी हो रहे हैं बहुत से राज्यों ने तो किसानो के क़र्ज़ तक माफ़ कर दिए हैं फिर भी क्यों नहीं रुक रहा यह आत्महत्याओं का दौर? इसके कई सारे कारण हैं, प्राकृतिक आपदा जैसे, बाढ़, सूखा, ओलावृष्टि जिसके कारण पूरी पूरी फसल का बर्बाद हो जाना, किसानो को उनकी फसल का उपर्युक्त समर्थन मूल्य नहीं मिलना, आवारा जानवरों के द्वारा फसलों को
बर्बाद कर देना आदि,  इसी कारण लोग कृषि के प्रति उदासीन भी हो रहे हैं और गांव छोड़ शहर की ओर पलायन कर रहे हैं|

प्राकतिक आपदाएं पहले भी आती थी पर आजकल इन आपदाओं ने भयाभव रूप ले लिया है, महाराष्ट्र राज्य के विदर्भ जिले में विगत वर्षो में भयंकर सूखा पड़ने से किसानो ने आत्महत्या की, अब सोचने वाली बात ये है की जो भारत देश आज विकासशील देश की श्रेणी से विकसित देश की श्रेणी में शामिल होने की ओर अग्रसर है उस देश अन्नदाता की इस दशा का जिम्मेदार कौन है, इस विषय पे गम्भीरता से विचार करने की आवश्यकता है |

हमारे पूर्व प्रधानमंत्री स्व श्री लाल बहादुर शास्त्री ने जय जवान जय किसान का नारा दिया था क्यूंकि वो ये जानते थे की जवान और किसान ये दोनों एक देश की शक्ति के आधारस्तम्भ हैं | सुप्रसिद्ध हिंदी साहित्यकार मुंसी प्रेमचंद जी की एक कहानी पुस की रात, किसान के जीवन चरित्र का सजीव वर्णन है, उन्होंने इस कहानी में ये बताया है की कैसे एक किसान खेती करने की वजह से क़र्ज़ में डूब जाता है, पूरी रात ठण्ड में बैठ कर अपनी फसल की निगरानी आवारा जानवरो से बचाने के लिए करता है फिर भी अपनी फसल नहीं बचा पाता है|

मैंने ईश्वर को तो नहीं देखा पर पृथ्वी पे ईश्वर का प्रतिनिधि किसान है ये मैं ढृणतापूर्वक कह सकती हूँ, अतः हमे किसानो द्वाराउगाये गए अन्न का आदर करना चाहिए और उन्हें बर्बाद होने से रोकने का प्रयास करना चाहिए, ये कर के शायद हम उन्हें सच्चा सम्मान दे सकेंगे |

जागृति अस्थाना -लेखक

#सम्बंधित :- Hindi Essay, Hindi Paragraph, हिंदी निबंध। 

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