भ्रूण हत्या पर निबंध

भ्रूण हत्या पर निबंध,
Hindi Nibandh bhrun hattya

जब औरतें गर्भवती होती है वह ख़ुशी का लम्हा माँ के लिए अनमोल होता है। लेकिन परिवार की चाहत क्या है बेटा या बेटी? गर्भवती औरतों के टेस्ट करने के लिए उन्हें अस्पताल ले जाया जाता है। वहां अल्ट्रासाउंड स्कैन के ज़रिये यह पता लगाया जाता है की माँ के कोख में लड़का है या लड़की। अगर लड़की हुई तो माँ के गर्भ में जन्म लेने से पहले लड़की को मार दिया जाता है। इसे अंग्रेजी में एबॉर्शन कहते है। भारत में भ्रूण हत्याएं अत्यधिक बढ़ रही है। कन्या भ्रूण हत्या एक कानूनन जुर्म है।

यह बहुत ही शर्मनाक है जिस भारत में देवी लक्ष्मी, दुर्गा और सरस्वती को पूजा जाता है वहां यह कन्या भ्रूण हत्याएं जैसे शर्मनाक काण्ड हो रहे है। भारत में तेज़ी से इनके आंकड़े बढ़ रहे है।

भारतीय समाज में लड़के होने पर खुशियां मनाई जाती थी और आज भी वैसे ही मनाई जाती है। आज भी कुछ परिवारों में यह अजीब सी मानयता है की अगर लड़के न हो तो परिवार का वंश कैसे आगे बढ़ेगा। गांव में यह रूढ़िवादी विचारधारा प्रचलित है। कई जगह पर लड़कियों के जन्म होते ही उसकी माँ से उसे छीनकर ज़िंदा दफना दिया जाता है। यह भयानक और निंदनीय घटनाएं है।

कन्या भ्रूण हत्या के लिए सामाजिक और कई संवेदनशील कारण है। अभी वक़्त बदल गया है, आज कल परिवारों में बेटियों के आने पर ज़्यादा खुशियां मनाई जाती है और कुछ लोग बेटियों को गोद लेकर उन्हें प्यार से बड़ा भी कर रहे है। पर कुछ परिवारों में यह पौराणिक सोच आज भी जारी है। कुछ कारण है जिसकी वजह से कुछ परिवार बेटियां नहीं चाहते है।

माँ -बाप बेटियां इसलिए नहीं चाहते क्यों की उसकी शादी होने पर उन्हें लाखों रुपये दहेज़ में देने पड़ेंगे। दहेज़ देना और लेना कानूनन अपराध है। कुछ लोगों को यह लगता है की लड़के पैसा कमा सकते है और परिवार का पेट पाल सकते है। लड़कियों को शादी करके पराया हो जाना है। लड़की के जन्म लेने से उन्हें फायदा या नुकसान होगा इसकी चिंता में पड़ जाते है। लड़की विवाह करके दूसरा घर बसा लेगी इसमें उनका क्या फायदा ?

समाज में ऐसी सोच वाले लोगों की हम कड़े शब्दो में निंदा करते है। अगर लड़का हुआ तो परिवार का नाम आगे बढ़ाएगा। बहुत सारे लोग की सोच यह है की समाज में परिवार की क्या इज़्ज़त रह जाएगी अगर लड़का नहीं हुआ तो ? उनकी समाज में नाक कट जाएगी अब क्या करें इन लोगों की सोच का जो पढियों से चली आ रही है इसलिए कन्या भ्रूण हत्याएं जैसी शर्मनाक घटनाओं को अंजाम दे रही है। विवाह होते ही नयी दुल्हन पर यह चिंता सताती है की अगर बेटी हुई तो उनकी कोख में बच्चे को मार दिया जायेगा। परिवार बहुओं पर दबाव डालता है की वो टेस्ट करवाए और पता लगाए की लड़का है या लड़की ?

अशिक्षा और अंधविश्वास जो बरसों से चली आ रही है उनपर अंकुश लगाने का वक़्त आ गया है। भारत में 48.2 प्रतिशत औरतों की संख्या है और 51.80 प्रतिशत पुरुषो की। कड़े कानून लागू करने की आव्सय्कता है। कोई भी परिवार या उसके कोई भी सदस्य ऐसा निंदनीय अपराध करते है तो उन्हें कठोर सजा मिले ताकि इन शर्मनाक गतिविधिओं पर अंकुश लग सके। माँ- बाप जो ऐसी घिनौनी चीज़े करते है उन पर जुरमाना लगे और सलाखों के पीछे रहे।

लोगों में जागरूकता फैलाने की अत्यंत आवशयकता है की लड़का लड़की एक सामान है। ऐसा कोई काम नहीं है जो लडकियां नहीं कर सकती। बहुत से फील्ड में लड़कियों ने लड़को को पीछे छोड़ दिया है। पढ़ाई हो या प्लेन चलना या ओलंपिक्स में मैडल जीतना लड़कियों ने हर क्षेत्र में झंडा गाड़ा है। लडकियां लड़को से किसी मामले में काम नहीं है। कृपया लड़कियों को पढ़ाये और उन्हें आगे बढ़ने दे।

नववधू को यह अवगत करवाए की अगर कोई भी उससे सेक्स डेटर्मिनेशन करवाने की बात करता है तो वह स्थानीय पुलिस की मदद ले सकती है। ताकि न चाहते हुए भी कोई माँ अपनी बेटी को न खोये। कन्या भ्रूण हत्या एक आत्महत्या है जिसे माओं को बहुत धक्का लगता है। इसी तरीके से लड़कियों की मौत होती गयी तो लड़कियों का दर लड़को के मुकाबले काम होता जायेगा जिससे अनेक गंभीर परिस्थितियां उत्पन्न हो सकती है।

पुरुष साशित समाज भी कन्या भ्रूण हत्या के लिए जिम्मेदार है। कन्या भ्रूण हत्या का प्रमुख कारण है लड़कियों को बेवजह बोझ समझना जो सरासर गलत है। यह पुराणी दकियानूसी परम्पराये कुछ अशिक्षित परिवारों में चलती है। यह विक्लांग्किक सोच समाज को एक गहरे खाई में धकेल देगा। पुरुष साशित समाज में महिलाओं को मानसिक, सामाजिक और परम्पराओं की धोस देकर दबाया जाता है। जो की शर्मनाक है। क्या लड़कियों का यही है वजूद की वह सिर्फ लड़को को जन्म दे। उनकी सोच, इच्छा भाव को समझना क्या परिवार और समाज का कर्त्तव्य नहीं है।

उपसंहार: हलाकि पहले के मुकाबले वक़्त काफी बदला है और सोच में भी परिवर्तन आ गया है। बेटी बचाओ और बेटी पढ़ाओ जैसे अभियान कार्यरत हुए है। जो की एक सकारात्मक सोच और भविष्य की और इशारा करता है। कई संसथान एनजीओस लड़कियों को बचाने, पढ़ने और आत्मनिर्भर करने के सुझाव दे रही है और उन्हें आत्मनिर्भर बनाने की हर संभव कोशिश कर रही है।

जो अस्पताल, डॉक्टर्स सेक्स रिकग्निशन के घिनोने अपराध कर रही है उनपर मुक़दमा चलाया जा रहा है और कड़े नियम लागु किये गए है। जो की फिर से एक सकारात्मक समाज के गठन करने की और इशारा कर रहा है, लड़कियों की पहचान सिर्फ चूल्हा -चौका करना नहीं है, बल्कि पड़ -लिखकर समाज को नयी दिशा की और ले जाने के साथ आत्मनिर्भर बनना भी है। लड़कियों को प्राथमिकता देना उतना ही जरुरी है जितना लड़को को। हम सबको मिलकर इस कन्या भ्रूण हत्याओं से समाज को छुटकारा दिलाना होगा।

सोच बदलने की जरुरत है, नयी सकारात्मक सोच से नविन समाज का गठन कर हमारे भारत को आगे ले जाना है। समाज में कहीं भी इस तरह के अपराधों का पता चले तो तुरंत इसकी खबर पुलिस को देनी चाहिए ताकि वह उन अपराधियों को कठोर सजा दे सके। लड़के -लड़कियों में भेद- भाव न करे, इसे उन सारे परिवारों को समझना है, जो लड़को को ज़्यादा महत्व देते है और ज़्यादा काबिल मानते है। देखा जाए तो ऐसे कई क्षेत्र है जहाँ लड़कियों ने लड़को को पछाड़ा है।

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