भूकंप पर निबंध

भूकंप निबंध हिंदी में
Essay on earthquake
[प्राकृतिक आपदा]


[भूकंप ]
Hindi essay on Earthquake 150 words

धरती के अचानक हिलने की घटना भूकंप कहलाती है। जब पृथ्वी के आंतरिक गर्म पदार्थों के कारण हलचल उत्पन्न होती है, तो भूकंप की स्थिति उत्पन्न होती है। कभी भूकंप हल्की तो कभी भारी तीव्रता का होता है। कम तीव्रता वाला भूकंप आने पर क्षेत्र-विशेष में धरती केवल हिलती महसूस होती है लेकिन इसका कोई दुष्प्रभाव नहीं होता। अधिक तीव्रता वाला भूकंप कभी-कभी भारी क्षति पहुँचाता है। कच्चे और कमज़ोर मकान ढह जाते हैं, चल-अचल संपत्ति का भारी नुकसान होता है। सैंकड़ों मनुष्य मकान के मलबे में दबकर मर जाते हैं। हज़ारों घायल हो जाते हैं। लोग बेघर-बार होकर अस्थायी निवास में रहने के लिए विवश होते हैं। परिस्थितियों के सामान्य बनाने में कई महीने या कई वर्ष लग जाते हैं। भूकंप को रोका नहीं जा सकता परंतु सावधानियाँ बरतने से इससे होने वाली क्षति ज़रूर कम की जा सकती है। इससे बचाव के लिए भूकंपरोधी भवनों का निर्माण करना चाहिए। भूकंप आने पर घबराना नहीं चाहिए बल्कि आवश्यक सावधानियाँ बरतनी चाहिए। भूकंप एक प्राकृतिक आपदा है, इसका मिल-जुलकर मुकाबला करना चाहिए।


भूकंप पर निबंध (Bhukamp) 
essay on earthquake in Hindi 400-500 words

भूकंप पृथ्वी का अपनी धुरी से हिलकर कम्पन करने की स्थिति को भूकम्प या भूचाल कहा जाता है। कभी-कभी तो यह स्थिति बहुत भयावह हो जाती है। इसके परिणामस्वरूप पृथ्वी के ऊपर स्थित जड़-चेतन हर प्राणी और पदार्थ का या तो विनाश हो जाता है या फिर वह सर्वनाश की-सी स्थिति में पहुंच जाता है। जापान के विषय में तो प्रायः सुना जाता है कि वहां तो अक्सर भूकम्प आकर विनाशलीला प्रस्तुत करते ही रहते हैं। इस कारण लोग वहां लकड़ियों के बने घरों में रहते हैं। इसी प्रकार का एक भयानक भूकम्प बहुत वर्षों पहले अविभाजित भारत के कोटा नामक स्थान पर आया था। उसने शहर के साथ-साथ हजारों घर-परिवारों का नाम तक भी बाकी नहीं रहने दिया था।

अभी कुछ वर्षों पहले गढ़वाल और महाराष्ट्र के कुछ भागों को भूकम्प के दिल दहला देने वाले हादसों का शिकार होना पड़ा था। प्रकृति की यह कैसी लीला है कि वह मानव-शिशुओं के घर-घरौंदों को तथा स्वयं उनको भी कच्ची मिट्टी के खिलौनों की तरह तोड़-मरोड़कर रख देती है। पहले यह भूकम्प गढ़वाल के पहाड़ी इलाकों में आया था, जहां इसने बहुत नुकसान पहुंचाया था। थोड़े दिन पश्चात् महाराष्ट्र के एक भाग में फिर एक भूकम्प आया जिसने वहां सब कुछ मटियामेट कर दिया था। महाराष्ट्र में धरती के जिस भाग पर भूकम्प के राक्षस ने अपने पैर फैला दिए थे वहाँ तो आस-पास के मकानों के खण्डहर बन गए थे। उन मकानों में फंसे लोग कुछ तो काल के असमय ग्रास बन गए थे, कुछ लंगड़े-लूले बन चुके थे। एक दिन बाद समाचार में पढ़ा कि वहां सरकार और गैर-सरकारी स्वयं-सेवी संस्थाओं के स्वयंसेवक दोनों राहत कार्यों में जुटे हुए थे। ये संस्थाएं अपने साधनों के अनुरूप सहृदयता का व्यवहार करती हुई पीड़ितों को वास्तविक राहत पहुंचाने का प्रयास कर रही थीं।

भूकम्प कितना भयानक था यह दूरदर्शन में वहां के दृश्य देखकर अन्दाजा हो गया था। जिन भागों पर भूकम्प का प्रकोप था वहां सब कुछ समाप्त हो चुका था। हल जोतने वाले किसानों के पशु तक नहीं बचे थे। दुधारू पशुओं का अन्त हो चुका था। सैकड़ों लोग मकानों के ढहने और धरती के फटने से मृत्यु को प्राप्त हो गए थे। इस प्रकार हंसता-खेलता संसार वीरान होकर रह जाता है। सब ओर गहरा शून्य तथा मौत का-सा सन्नाटा छा जाता है। कभी-कभी मैं सोचता हूं कि जापान के लोग कैसे रहते होंगे जहां इस प्रकार के भयावह भूकम्प आए दिन आते रहते हैं।

26 जनवरी, 2001 को गुजरात सहित पूरे भारत ने भूकंप का कहर देखा। भुज सहित संपूर्ण गुजरात में भारी जान-माल का नुकसान हुआ। 8 अक्टूबर, 2005 को पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर और उससे सटे भारतीय कश्मीर में दिल दहला देने वाला जो भूकंप आया उसमें जहाँ एक लाख से अधिक लोंग काल के गाल में समा गए, वहीं लाखों लोग घायल हुए। अरबों रुपए की संपत्ति की हानि हुई।

भूकंप वैज्ञानिकों का कहना है कि अभी तक ऐसा कोई उपकरण-यंत्र विकसित नहीं हुआ है, जिससे यह बात पता चल सके कि अमुक-अमुक क्षेत्रों में भूकंप आने वाला है। भूकंप के आते समय ‘रिक्टर स्केल’ पर सिर्फ उसकी क्षमता का ही माप लिया जा सकता है। जापान, पेरू व अमेरिका के कुछ राज्यों में जहां भूकंप के झटके अकसर महसूस किए जाते हैं, वहां के वैज्ञानिकों ने भूकंपरोधी मकानों (Earthquake Resistance) का निर्माण किया है। भारत के भूकम्प प्रमाणित क्षेत्रों में भी ‘भूकंपरोधी’ मकानों के निर्माण की प्रक्रिया शुरू करने के लिए सरकार को कारगर नीति बनानी चाहिए।


Bhukamp par nibnadh
भूकंप निबंध हिंदी में – 600 -700 words

भूमि के हिलने को भूचाल, भूकंप और होला-डोला कहा जाता है। धरती का ऐसा कोई भी कोना शेष नहीं, जहाँ कभी-न-कभी भूचाल न आया हो। भूकंप के मामूली झटकों से तो कोई विशेष हानि नहीं होती, लेकिन जब कभी जोर के झटके आते हैं, तो बहुत भयंकर और विनाशकारी परिणाम देखने को मिलते हैं। सैकड़ों वर्षों की लगातार कोशिशों के बाद भी वैज्ञानिक भूकंप या उससे होनेवाली हानि की रोकथाम का उपाय आज तक नहीं कर पाए।

भूकंप क्यों आते हैं ? इस संबंध में भिन्न-भिन्न मत प्रचलित हैं। भूगर्भशास्त्रियों की राय है कि पृथ्वी के भीतर की तहों में सभी धातुएँ और पदार्थ आदि तरल रूप में बह रहे हैं। जब वे भीतर की गरमी के कारण अधिक तेजी से बहते और फैलते हैं तो धरती काँप उठती है। कभी-कभी ज्वालामुखी पर्वतों के फटने से भी भूकंप आ जाते हैं। एक अन्य मत यह भी प्रचलित है कि पृथ्वी के भीतर मिट्टी की तहों के बैठने (धसकने) से भी धरती हिल उठती है।

भारत में कुछ धर्मभीरु लोगों की यह धारणा है कि पृथ्वी के जिस भाग पर पाप बढ़ जाते हैं वहाँ की जमीन काँप उठती है। यह कथा भी प्रचलित है कि शेषनाग, जिन्होंने अपने सहस्र फनों के ऊपर पृथ्वी को उठाया हुआ है, जब अपने सिर को हिलाते हैं तो भूकंप आ जाता है। कुछ पहले के अर्थशास्त्रियों का विचार था कि संसार में जब जनसंख्या अधिक बढ़ जाती है तो उसे कम करने के लिए प्रकृति भूकंप लाकर उसे कम कर देती है।

भारत देश में विगत डेढ़ सौ वर्षों में सात बड़े-बड़े भूकंप आए हैं। सबसे भीषण भूकंप कलकत्ता में ११ अक्तूबर, १९३७ को आया था, जिसमें तीन लाख व्यक्ति मारे गए थे। दूसरा भयंकर भूकंप असम का था, जो १५ अगस्त, १९५० को आया था। उसमें डेढ़ हजार व्यक्ति मरे थे और उसके झटके उत्तर में बनारस से लेकर दक्षिण-पूर्व में रंगून तक महसूस किए गए थे। उससे भूमि के धरातल में हुए परिवर्तनों के परिणामस्वरूप असम की महत्त्वपूर्ण नदियोंलोहित और छिहांग ने अपना रास्ता बदल लिया था। इन नदियों और ब्रह्मपुत्र नदी में आई बाढ़ से अपार हानि हुई थी।

इसके बाद बिहार के भूचाल का नंबर आता है, जो १५ जून, १९३४ को आया था। इसके झटके से बिहार, उड़ीसा, बंगाल, उत्तर प्रदेश आदि प्रांत हिल गए थे और पटना, मुजफ्फरपुर, गया और मुंगेर जिलों को विशेष हानि उठानी पड़ी थी। इसके कारण हुई उथलपुथल में सैकड़ों आदमी मर गए। मुंगेर शहर तो सारा नष्ट हो गया। धरती से ऐसी जहरीली गैसें निकलीं, जिन्हें सिर्फ सूंघने से ही अनेक मनुष्यों को जान से हाथ धोना पड़ा, यातायात के सभी साधन नष्ट हो गए। महीनों तक खुदाई का काम जारी रहा और धरती में दबी हुई लाशें बाहर निकलती रहीं।

इनके अतिरिक्त १८ मई, १९५५ को अंजार (जिला भुज) कच्छ में, २९ मई, १९४१ को अंडमान में और १८ मई, १९५५ को निकोबार में भूकंप आए जिनसे बहुत हानि हुई। सन् १९७५ में हिमाचल प्रदेश में भी भूकंप आया, जिससे सैकड़ों लोग मर गए और हजारों बेघर हो गए।

भारतीय उप-महाद्वीप में एक और भयंकर भूकंप ३१ मई, १९३५ को क्वेटा में आया था, जिसमें सारा क्वेटा शहर नष्ट हो गया था और साठ हजार व्यक्ति मर गए थे।
जापान में तो अकसर भूचाल आते रहते हैं। इसलिए वहाँ लकड़ी और गत्ते आदि से मकानों का निर्माण किया जाता है। अभी कुछ वर्ष पहले टर्की में एक भयंकर भूचाल आया था, जिसमें बारह हजार व्यक्ति दबकर मर गए थे। अक्तूबर १९५६ में दिल्ली और आसपास के इलाके में केवल एक मिनट के भूकंप के झटके से ही लगभग ढाई हजार मकान क्षतिग्रस्त हो गए थे।

११ दिसंबर, १९६७ को प्रात: चार बजकर बाईस मिनट पर सतारा जिले के कोयना नगर और उसके आसपास के पचास गाँवों में भीषण भूकंप आ जाने के कारण सौ से अधिक व्यक्ति मर गए और लगभग तेरह सौ घायल हो गए थे। इसका प्रभाव बंबई, पूना, किर्की, पणजी, हैदराबाद व औरंगाबाद आदि अनेक नगरों पर पड़ा।
२३ सितंबर, १९८५ को मैक्सिको में आए भूकंप में बीस हजार व्यक्ति मारे गए और काफी मकान ध्वस्त हो गए।
वैज्ञानिक अभी तक भूकंप और उससे होनेवाली हानियों की समस्या को हल नहीं कर पाए हैं।


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