[Monday, 3 August] रक्षाबंधन (कच्चे धागों का पक्का बंधन) 

शहरों में बढ़ता प्रदूषण पर निबंध

शहरों में बढ़ता प्रदूषण पर निबंध
Shehron mein badhta pradushan

आजकल दुनिया में प्रदूषण की मात्रा बढ़ती चली जा रही है। खासकर शहरों में तेज़ी से बढ़ता हुआ यह प्रदूषण प्रकृति, मनुष्यों और जीव जंतुओं के लिए हानिकारक है। जितनी उन्नति विज्ञान और प्रौद्योगिकी ने की है , उतना ही उसका गहरा प्रभाव गहरा प्रकृति और पर्यावरण पर पड़ा है। आज हम कई विपदाओं का सामना कर रहे है, उसमे से एक प्रदूषण भी है। जब पृथ्वी के वातावरण में गंदगी फैलाने वाले पदार्थ और वस्तु पाए जाते है, जिसके कारण जल, हवा, मिटटी जैसे प्राकृतिक संसाधन प्रदूषित हो रहे है, उसे प्रदूषण कहा जाता है। शहरों को कई दशकों से उन्नत और शक्तिशाली बनाने के लिए वन, पेड़ इत्यादि धरल्ले से काटे जा रहे है क्यों कि उसकी जगह पर बड़ी इमारत, बिल्डिंग्स, शॉपिंग मॉल, फैक्ट्रीज बनाये गए है और अभी भी बनाये जा रहे है। मनुष्य तरक्की और कामयाबी पाने के लिए अपनी ही सुन्दर प्रकृति को कई वर्षो से नुकसान पहुँचा रहा है।

प्रदूषण के लिए मानव जाति खुद जिम्मेदार है। मनुष्य ने अपने स्वार्थ सिद्धि के लिए प्राकृतिक संसाधनों का कई जगह गलत उपयोग किया है। जीव जंतुओं के प्राकृतिक आवास को नष्ट किया है। जिसकी वजह से कई जीव जंतु विलुप्त हो गए है। कई जीव जंतु गाँव और सड़को पर पाए गए है। अगर हम उनसे उनका घर छीन लेंगे तो वह हमारे घरो तक पहुँच जाएँगे।

प्रदूषण का प्रमुख वजह है शहरीकरण। मानव ने शहर निर्माण में ज़्यादा ध्यान दिया है। औद्योगीकरण के स्तर में विकास हुआ।  अत्यधिक औद्योगीकरण के कारण वायु, जल और मिटटी प्रदूषित होने लगे है। आये दिन कल-कारखानों से निकलने वाला जानलेवा धुँआ वायु को प्रदूषित कर रहा है। दिल्ली, मुंबई, चेन्नई और कोलकाता जैसे महानगरों में प्रदूषण अपने चरम सीमा पर पहुँच गया है। जनगणना के अनुसार प्रदूषण भारत और कई देशो में उच्चतम स्तर पर पहुँच गया है।

कल कारखानों से निकलने वाला मालवा जल में प्रवाहित कर दिया जाता है। मनुष्यों ने कई नदियों को ऐसे ही प्रदूषित कर दिया है, जिसके लिए जीवन हमारी कठिन परीक्षा ले रहा है। परिणाम स्वरुप आज हम प्रदूषित शहर में जीने के लिए मज़बूर है। इन प्रदूषणों के कारण मनुष्य को कई प्रकार के स्वास्थ्य संबंधी परेशानियों को झेलना पड़ रहा है। हमे इस प्रकार के तेज़ी से बढ़ते हुए प्रदूषण को रोकने के लिए कठोर प्रयास करने होंगे ताकि हम अपने आने वाले पीढ़ी को एक स्वास्थ्य समाज दे सके।

पहले पेड़ो पर चिड़िया चहकती थी, पेड़ और पौधों से भरे उद्यान होते थे, बच्चे खुले आकाश के नीचे खेलते थे। आज वैसा बिलकुल नहीं है। इसका श्रेय जाता है नियमित प्रदूषण को। पेड़ो को दिन प्रतिदिन काटे जा रहे है। कई जगहों पर वृक्षारोपण किये जा रहे है। वृक्षारोपण की गति को बढ़ाने की ज़रूरत है। पेड़, पौधों से हमे ऑक्सीजन प्राप्त होता है, साथ ही कई ज़रूरी सामग्री वृक्षों से मिलती है।  अगर वृक्ष नहीं होंगे तब पृथ्वी की इस सुन्दर प्रकृति को बचा पाना नामुमकिन है। शहरीकरण के कारण लोगो को एक जगह से दूसरे जगह जाने के लिए वाहनों की ज़रूरत पड़ती है। सड़क पर बढ़ता हुआ ट्रैफिक, गाड़ियों से निकलने वाला धुँआ हमे साँस नहीं लेने देता है।कल कारखानों से निकलने वाली जहरीली गैस मनुष्य और प्रकृति में रहने वाले सारे जीवो के लिए हानिकारक है। इस का निवारण करना ज़रूरी है।

मिटटी में जहरीली तत्वों के मिलने के कारण, मिटटी का प्रदूषण हो रहा है। वृक्षों की जड़े बाढ़ के समय मिटटी के कणो को पकड़ कर रखती है। अगर वृक्ष काटे जाएँगे तब भूमि कटाव बढ़ता चला जाएगा। जनसँख्या वृद्धि के कारण शहरों में प्राकृतिक जल स्रोत कम पाए जाते है, जो है वह तेज़ी से प्रदूषण की बलि चढ़ रहे है। शहरों में आये दिन शोर सराबे वाले कार्यक्रम आयोजित होते है और ट्रैफिक में गाड़ियों के हॉर्न के शोर से ध्वनि प्रदूषण को बढ़ावा मिल रहा है।

शहरीकरण ने जहाँ इतनी उन्नति की, वहाँ उसने पर्यावरण के लिए भयंकर परिस्थितियाँ पैदा की है। हमारे पास आधुनिक जीवन और आरामदायक साधन है, लेकिन अच्छा पर्यावरण नहीं है, जिसमे हम निश्चिंत होकर साँस ले सके। आबादी देश में ज़्यादा होने के कारण  भवनों, मार्ग और पुलों को बनाने के लिए स्थान नहीं मिल पा रहा है जिसके कारण मनुष्य वनो की कटाई कर रहे है।

गाँव की तुलना में शहर का वातावरण प्रदूषित ज़्यादा है। शहरों में फल, सब्जी इतनी अधिक ताज़ा नहीं मिलती जितना गाँव में प्राप्त होता है। शहरों में लोग पौधे इत्यादि कम लगाते है और लगाने के लिए उन्हें स्थान नहीं मिल पाता है मगर गाँव में लोग खुले खलिहान  में रहते है, आये दिन खेती बाड़ी करते है और पेड़ पौधों का ध्यान रखते है। गाँव में शौचालयों की कमी होने के कारण वातावरण खराब हो रहा है। कई  गाँव के लोग अपने दैनिक कार्य को पूरा करने के लिए तालाब या छोटी झील का उपयोग करते है , जिससे जल बुरी तरीके से प्रदूषित हो रहा है।

शहरीकरण के जितने फायदे है और उतनी ही अधिक समस्याएँ है। हिल स्टेशनों में आजकल पहाड़ो और पेड़ो को काटकर सड़क और होटल बनाये जा रहे है। असीमित मात्रा में पेड़ पौधों के कटाव पर वन विभाग को रोक लगाने की आवश्यकता है। पवित्र कही जाने वाली गंगा भी पवित्र ना रही बल्कि दूषित हो गयी है।

मनुष्यो के इन असीमित हरकतों की वजह से गंगा जी का पानी दूषित हो गया है। इसमें कारखानों के रासायनिक पदार्थ प्रवाहित किये जा रहे है। वायु प्रदूषण के कारण शहरों में लोग फेफड़ो की बीमारी इत्यादि से पीड़ित है। शहरों में दिवाली जैसे उत्सव पर अतिरिक्त पटाखे नहीं चलाने चाहिए। इससे कई ज़्यादा वायु और ध्वनि प्रदूषण होता है। हम विभिन्न प्रकार के दिए जलाकर भी इस त्यौहार को मना सकते है। प्लास्टिक जैसे चीज़ों का उपयोग हमें बंद करने होंगे। कागज़ो का सही से इस्तेमाल करने चाहिए, क्यों कि इसके लिए बम्बू यानि बांस के पेड़ काटे जाते है।

निष्कर्ष

प्रदूषण को रोकने का महत्वपूर्ण उपाय है जनसंख्या में नियंत्रण लाना। भारत सरकार अगर शहरों में दी जाने वाली अतिरिक्त सुविधाएँ गाँव में उपलब्ध करवाएँगे, तब गाँव के लोग अपने गाँव से भागकर रोज़गार के लिए शहरों में नहीं आएँगे। हालांकि सरकार ने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की है, लेकिन फिर भी अधिकाँश गाँव में बिजली, पानी जैसी सुविधा कम मिल पा रही है। गाँव को भी उन्नत करने की ज़रूरत है, लेकिन पर्यावरण को नुकसान पहुँचाकर बिलकुल नहीं। प्रदूषण को रोकने के लिए सरकार ने आवश्यक कदम उठाएँ है, लेकिन देश की जनता को भी जागरूक रहने की ज़रूरत है। आस –पास की साफ़ सफाई और कूड़े को किसी भी स्थल पर ना फेकना जैसे छोटे कदम हर व्यक्ति को उठाने होंगे। हफ्ते में दो दिन हमे बस का उपयोग करना होगा, अपने निजी वाहनों का नहीं। अगर प्रत्येक व्यक्ति ऐसा करेगा, तो वायु प्रदूषण नियंत्रण में आ सकती है। हम सब को मिलकर शहरों में बढ़ रहे इस प्रदूषण के रोकथाम के लिए बेहतर उपाय करने होंगे।

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