[Monday, 3 August] रक्षाबंधन (कच्चे धागों का पक्का बंधन) 

वसंत ऋतु पर निबंध

भारत में प्रमुख रूप से कुछ ऋतुएं क्रमश: आती हैं। ये हैं हेमंत, शिशिर, वसंत, ग्रीष्म, वर्षा एवं शरद। जहाँ वर्षा ऋतुओं की रानी मानी जाती है, वहीं वसंत ऋतुओं का राजा माना जाता है। ‘वसंत’ से तात्पर्य ‘दीप्तिमान’ है। माघ शुक्ल पक्ष से फाल्गुन पूर्णिमा तक इस ऋतु का धरती पर आधिपत्य रहता है। जड़ चेतन एक अनूठी शक्ति एवं स्फूर्ति से भर उठते हैं। दिग-दिगांतर सुवासित, मदमस्त एवं निर्मल हो उठते हैं।

माना जाता है कि वसंत पंचमी के दिन ज्ञान की देवी सरस्वती का जन्म हुआ था। इसलिए बंगाल में इस दिन ‘सरस्वती‘ माँ की पूजा की जाती है। लोग पीले वस्त्र पहनकर पूजा करते हैं और पीले मिष्ठान्न तैयार करते हैं। पौराणिक मत के अनुसार ‘वसंत’ को कामदेव का पुत्र माना जाता है। कहा जाता है कि कामदेव के पुत्र के जन्म का संदेश पाकर सारी प्रकृति झूम उठी तथा अपने अकूत सौंदर्य से धरती को मालामाल कर दिया था।

वसंत ऋतु में ‘वसंत पंचमी का पर्व बड़े उत्साह से मनाया जाता है। इस दिन लोग पीले वस्त्र पहनते हैं, पीले रंगों की मिठाइयाँ, पीले रंग के चावल आदि बनाए जाते हैं। स्त्रियाँ और लड़कियाँ वसंत-पंचमी के गीत-गाकर झूला झूलती हैं। विदयालयों में इस दिन समारोह और रंगारंग कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है। ‘वसंत पंचमी’ पर आधारित गीत, कव्वालियाँ गाई जाती हैं, लोकनृत्यों का आयोजन किया जाता है। नर्तक पीले फूलों के आभूषणों से अपना श्रृंगार करते हैं। चारों ओर मौज-मस्ती एवं आनंद का वातावरण छाया रहता है। मेलों आदि का आयोजन भी होता है।

वसंत ऋतु की सुंदरता का वर्णन करना अत्यंत दुष्कर कार्य है चाहे जितना वर्णन करो फिर भी लगता है कि अभी भी कुछ कमी रह गई

“धरती का तन मादक मोहक
अंग-अंग में कुसुम खिले हैं
रसाल रसिक कोयल कूके
अलि कलि कुंज गुंजित हुए हैं
ऋतुराज का संदेशा पाकर
अलमस्त झूमे अवनि अंबर।”

शीत ऋतु के प्रस्थान के साथ ही वसंत का आगमन होता है। वृक्ष, लताएं नव-पल्लव धारण करते हैं मानो वे ऋतुराज के स्वागत में नूतन वस्त्र पहने हैं। पुष्पों-कलियों से लदे वृक्ष एवं लताएं फूलों के वितान ताने खड़े से दीखते हैं मानो वे अपने सर्वोत्तम श्रृंगार से ऋतुराज को रिझाना चाहते हैं। आमों पर बौर आ जाते हैं। यहाँ-वहाँ रंग-बिरंगे फूल विहंसते प्रतीत होते हैं। चारों तरफ मखमली हरियाली छा जाती है। कहीं मौलसिरी के फूल अपनी छटा बिखेरते हैं तो कहीं गुलमोहर अपनी झालरों से धरती का श्रृंगार करता है। तड़ागों-जलाशयों में सरसिज अपनी सुंदरता से सबका मन मोह लेते हैं। जूही, चंपा, गुलाब, चमेली, गुलमोहर, सूरजमुखी आदि फूल अपने सौंदर्य से प्रकृति का श्रृंगार करते हैं। अमराइयों में आम्रमंजरियाँ प्रकृति को सुवासित करती हैं।

खेतों में पीली-पीली सरसों देख लगता है मानो धरती ने स्वर्णिम साड़ी पहनी हो। फूलों पर रंग-बिरंगी तितलियाँ, मंडराते भंवरे मंजरियों पर गुंजन करते हैं। मदमस्त मंद, बावली, मस्तमौला, सुगंधित पवन प्राणीमात्र को ही प्रसन्नचित्त, उल्लसित, उत्साहित नहीं करती अपितु संपूर्ण प्रकृति को ही चेतना और स्फूर्तिमय कर देती है। अमराइयों में कोयल की कुहूकुहू की कर्णप्रिय ध्वनि सुनाई देती है जो प्रकृति को संगीतमय बनाकर मानव मन को मदमस्त कर देती है। पक्षियों का चहकना प्रकृति में झंकार पैदा कर देता है।

तन-मन को चुस्ती-स्फूर्ति और प्रकृति को चेतना एवं जीवंत रूप प्रदान करने वाली यह ऋतु स्वास्थ्य के लिए अत्युत्तम है। ऋषि-मुनियों ने इस ऋतु में सैर करने को सर्वोत्तम पथ्य माना है। इस ऋतु में मन प्रसन्न एवं उत्साहित रहता है। हर काम करने का जोश अंग-अंग को फड़का देता है। अधिक शीतोष्ण न होने के कारण इस समय की जलवायु स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभकारी है। शरीर में शक्ति, स्फूर्ति और मस्ती का संचार होता है। रंग-बिरंगी तितलियाँ, मंडराते भंवरे, फूलों से भरी क्यारियों के मध्य विचरण करना स्वर्ग में निवास करने से कहीं कम नहीं है।

इस सुंदर मौसम में लोग पिकनिक अथवा लांग-ड्राइव पर जाना पसंद करते हैं। सुंदर प्रकृति के निकट रहकर तन-मन मस्तिष्क को प्रफुल्लित करते हैं। मन उन्मत्त हो उठता है। हर्षातिरेक से मनुष्य का अंग-अंग खिल उठता है। कवियों की चहेती वसंत ऋतु उन्हें भावों से ओत-प्रोत कर देती है। अधिकांश कवियों, लेखकों ने अपनी रचनाओं में कम या अधिकता में वर्सत की सुंदरता का वर्णन अवश्य किया है।

वसंत ऋत में ही रंगों से सराबोर करने वाली रंग-बिरंगी होली आती है जो इस विचित्र ऋतु की विचित्रता एवं सौंदर्य को अनुपम, अलौकिक एवं पावन बना देती है। अपनी पकी फसल एवं लहलहाते खेतों को देख किसान झूम उठते हैं। उसी झम, मस्ती, उमंग में वे धूम-धड़ाके से

बैसाखी का त्योहार मनाते हैं। बैसाखी का मस्ताना त्योहार पंजाब में प्रमुखता से मनाया जाता है। लोग रंग-बिरंगे परिधान में सजकर भंगड़ा नाचते, गिद्दा डालते, मिठाइयाँ बाँटते, त्योहार की बधाइयाँ देते हुए गले मिलते हैं। मेलों आदि का व्यापक रूप से आयोजन किया जाता है। _इस प्रकार वसंत सबको सौंदर्ययुक्त, चेतनायुक्त, मस्तमौला, उल्लसित, उमंग, स्फूर्ति से भरपूर करता हुआ, सबको अपने रंग में रंगता हुआ, जन-जन में, प्राणी-प्राणी में जीवन का मंत्र फूंकता है। तभी इस को ऋतुराज, मधुमास, वसंत, बसंत आदि उपाधि से विभूषित किया गया है, क्योंकि ऋतुओं का सिरमौर तो ‘वसंत’ ही है।

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