[Monday, 3 August] रक्षाबंधन (कच्चे धागों का पक्का बंधन) 

योग साधना एवं तनाव मुक्त जिंदगी पर निबंध

निबंध: योग साधना एवं तनाव मुक्त जिंदगी

प्रस्तावना :- वर्तमान समय प्रतिस्पर्धा का है। प्रतिस्पर्धा के चक्कर में मानव जीवन हाई-स्पीड ट्रेन की भांति समय दर समय दौड़ता प्रतीत हो रहा है। इस विशेष जीवन शैली को जीवन में अंगीकार करने से मनुष्य के स्वास्थ्य पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है। आज हर आय वर्ग का मनुष्य शुगर, उच्च रक्तचाप एवं मानसिक तनाव से पीडित है। इन रोगों के कुप्रभाव से बचने के लिये जो दवाएँ सेवन की जा रही है, वे भी मनुष्य के अन्य अंगो को प्रभावित कर रही है। दवा खाएँ या नहीं, यह भी विस्मयकारी प्रश्न समाज में बन गया है।

वर्तमान मनुष्य जीवन में तनाव का अस्तित्व : मनुष्य के लिये तनाव हर जीवन की जिम्मेदारियों से है। घर का खर्चा, बच्चों की पढ़ाई, बैंक ऋण का भुगतान, यदि बच्चे विवाह योग्य है तो उनके विवाह प्रस्ताव, विवाह तय हो चुका है तो उसके लिये निधि का प्रबंधन। यदि कार्य स्थल का जिक्र किया जाये तो यदि नौकरी लक्ष्य आधारित उद्देश्यों की पूर्ति हेतु है, तो उस लक्ष्य को हासिल करने का तनाव। तनाव से मनुष्य जीवन एक विषैले पेय पदार्थ की तरह हो गया है जिसे पीना भी जरूरी है एवं पीने के बाद कड़वाहट महसूस करना भी जरूरी है।

तनाव से मनष्य जीवन में प्रभाव :- तनाव से मानव जीवन पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ रहा है। यदि स्वास्थ्य पर बात की जाये तो वर्तमान में प्रचलित मुख्य व्याधियाँ यथा उच्च रक्तचाप, मधुमेह, थॉयराइड, हृदयाघात आदि तनाव की ही देन है। तनाव से व्यक्ति चिड़चिडा भी हो जाता है एवं क्रोधावेश में भी जल्दी आ जाता है। स्वभाव परिवर्तन से जहां परिवार जन तो पीडित होते ही है, कार्य स्थल एवं सामाजिक संपर्क के लोग भी दूरी बना लेते हैं। परिणाम कभी-कभी यह होता है तो कि व्यक्ति में एकान्त रहने की प्रवृति जन्म ले लेती है एवं मानसिक रोगों से पीडित भी हो जाता है। कभी-कभी तनाव से अनिद्रा रोग भी हो जाता है जिससे अन्य रोग भी व्यक्ति को घेर लेते है। कुल मिलाकर यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि तनाव ही मनुष्य जीवन के पतन का प्रमुख मूल है।

तनाव-मुक्ति हेतु ली जा रही दवाओं का प्रभाव: तनाव से मुक्ति हेतु ली जा रही दवाएं प्रभाव तो डालती है पर बहुत ही न्यून मात्रा में। इसके विपरीत तंत्रिकातंत्र को बिगाड देती है। कई दवाओं का तो मनुष्य की किडनी एवं पाचन तंत्र पर इतना बुरा प्रभाव पड़ता है कि जीवन कष्टमय हो जाता है। ये दवाएँ मनुष्य को आर्थिक रूप से कमजोर करने के साथ शारीरिक रूप से भी निष्क्रिय करना शुरू कर देती है। कभी-कभी दवाओं एवं तनाव की असंतुलित मात्रा होने से पक्षाघात भी हो जाता है जोकि मनुष्य को मृत प्राय बना देता है।

वर्तमान जीवन शैली में योग-साधना का महत्व : इस कष्टमय निदान से बचने का सबसे सुरक्षित एवं प्राकृतिक साधन है, योग। योग कोई वर्तमान युग का अविष्कार नहीं है यह तो वेदकाल की उपज है जो महर्षि पतंजलि द्वारा भारतवर्ष के बाशिंदो को परिचित करवाई गई। योग की कुछ क्रियाओं से मनुष्य के अनेकों रोगों का निदान योग में समाया हुआ है। बीते कुछ वर्षों में योग ने भारतवर्ष में लोगों की जीवन शैली में अपना अनूठा स्थान बना लिया है। आज प्रात:काल हमारे आस-पास के उद्यानों में लोगों का झुण्ड योग करते हुये देखा जा सकता है।

योगासन से लोग अपने जीवन के तनाव को कुछ हद तक मिटा चुके है एवं स्वस्थ जीवन की परिकल्पना साकार लगने लगी है। लोगों ने कुछ योग क्रियाओं को जीवन में अपनाकर ऐलोपैथिक दवाओं के प्रतिदिन सेवन से मुक्ति पाई है। जीवन तनाव मुक्त बना है एवं शारीरिक रूप से सुदृढ बन रहे हैं। आज पूरे विश्व में योग के प्रति आस्था अत्यन्त अनुसरणीय विषय बन गई है। “योग भगाये रोग” तथा ‘योगा से ही होगा’ जीवन के मंत्र बन गये है।

योग साधना एवं तनाव मक्त जिंदगी :- तनाव मुक्त जिंदगी जीने का एक मात्र उपाय है – ‘योग साधना’। प्रात: काल एवं सायंकाल के केवल 30 मिनिट आपके जीवन में अविश्वसनीय परिवर्तन के लिये काफी है। आज हर पार्क में आपको योगा के प्रति लोगों का आकर्षण मिल जायेगा। सूर्य-नमस्कार, भ्रामरी प्राणायाम, कपाल-भारती, अनुलोम-विलोम ने पूरे जगत में रोग निदान के मामले में क्रांतकारी परिवर्तन लाया है, लोग उच्च रक्तचाप, मधुमेह, मोटापा का स्तर घटाकर युवा ऊर्जा महसूस कर रहे हैं। जो लोग अत्यधिक तनाव में है वह प्रात:जल्दी उठकर प्रकृति की छटा में भ्रमण करें, हल्के-हल्के प्राणायाम करें, जल्दी ही जीवनमें परिवर्तन को आत्म-साक्षात होने का अवसर प्राप्त करें। पुराने युग में ऋषि महर्षि योगा द्वारा मस्तिष्क की कुंडली जागृत कर एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति तक बात कर लेते थे चाहे वह कितने किलोमीटर दूर बैठा हो। उस प्रणाली के सामने तो आज का सूचना तकनीकी तंत्र एवं इंटरनेट भी असफल है। आज उस प्रणाली के बारे में तो अनभिज्ञता है परंतु रोग निदान के लिये योगा का प्रयोग तो उच्च स्तर पर है।

आज विज्ञान भी मानने लगा है कि योगा ने चमत्कारी परिवर्तन समाज में लाये है। योगा की महत्वपूर्ण भूमिका को देखते हुये वर्ष 2014 से प्रतिवर्ष 21 जून को अंतर्राष्ट्रीय योगा दिवस पूरे विश्व में मनाया जाता है। आज के प्रगतिशील मानव को चाहिये कि वह कुछ समय योगा को देकर अपने अमूल्य शरीर को ऊर्जावान व स्वस्थ बनाये। योगा से मौजूद रोगों में तो सुधार आयेगा ही शरीर सौष्ठव एवं ऊर्जावान भी बनेगा। भारत वर्ष में उपलब्ध जनगणना के अनुसार युवाओं का प्रतिशत सबसे ज्यादा है, अत: यदि योगा युवाओं के जीवन में अंगीकृत होगा, यहां के युवा अधिक सामर्थ्यवान, निरोगी एवं स्फूर्ति युक्त बनेगें। देश को एक शक्तिशाली सोच मिलेगी एवं लोग आर्थिक रूप से सुदृढ़ बनेंगे। रोगों पर होने वाला खर्च निजी प्रगति एवं देश निर्माण में काम आयेगा।

योग शिक्षा का महत्व : जीवन में योग साधना अपनाने के लिये आवश्यक है कि बच्चों को विद्यार्थी जीवन से ही योग शिक्षा दी जाये क्योंकि योग का प्रभाव तभी होगा जब वह सही विधि से किया जाये। भारतवर्ष में सरकार को चाहिये कि योग शिक्षा अनिवार्य विषय के रूप में विद्यालयों में अध्ययन कराई जानी चाहिए। अधूरा योग ज्ञान मनुष्य के स्वास्थ्य पर कुप्रभाव डालेगा।

भारत वर्ष में योग : – वर्तमान में कई संस्थाएं भारत के योगा का प्रचार-प्रसार कर रही है जिनका कार्य प्रशंसनीयहै। बडे-बड़े योग चिकित्सा केंद्र भी भारत में चल रहे हैं जो प्राकृतिक चिकित्सा के माध्यम से जटिल से जटिल रोगा का निदान उपलब्ध करवा रहे है। कई संस्थाएं योगा में अग्रिम अनुसंधान का प्रयास कर रही है। चूंकि योगा भारत की संपूर्ण विश्व की देन है, अत: योगा के प्रति अधिकाधिक ध्यानाकर्षण आवश्यक है।

उपसंहार – यदि व्यक्ति जीवन को उन्मुक्त बनाना चाहता है तो योगा सर्वश्रेष्ठ साधन है। इस क्षेत्र में अभी और अनुसंधान बाकी है। योग साधना अपने आप में ईश्वरीय भक्ति का प्रतिपूरक है, जब प्राचीन युग में ईश्वर की प्राप्ति संभव थी तो स्वस्थ जीवन तो एक तुच्छ सी बात है। अभी लोगों को इस योग-साधना के प्रति भ्रांतियाँ है जिनका उचित शिक्षा प्रसार द्वारा निदान परमावश्यक है। अभी योग सभी लोगों की पहुंचसे दूर है, स्थानीय सरकारों को चाहिए कि भारतवासियों को स्वस्थ बनाने के लिये योग शिक्षा का प्रचार-प्रसार मुफ्त में करवायें, जागृति लाये। समाज को स्वस्थ बनाये। क्योंकि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मस्तिष्क निवास करता है। मंजिल दूर है पर प्रयासों के आगे असंभव नहीं।

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