शिक्षा पद्धति पर निबंध

शिक्षा पद्धति पर निबंध
(Essay on Education system)

शिक्षा पद्धति Long paragrapgh
Hindi Essay on [Education system] shiksha paddhati 

माँ सरस्वती की वन्दना से लेकर गुरुकुल में योग्य गुरुओं से मौखिक शिक्षा पाने वाले इस देश में शिक्षा का कितना महत्व है यह सर्व विदित है। यद्यपि समाज के वर्ण व्यवस्था पर आधारित होने के कारण हर वर्ग को शिक्षा पाने का अधिकार प्राप्त नहीं था। धीरे-धीरे समाज में परिवर्तन आया और वर्ण व्यवस्था का विरोध होने लगा। आज के समाज में शिक्षा का अधिकार मौलिक अधिकार बन गया है। भारतीय संविधान के अनुसार हर नागरिक को शिक्षा पाने का अधिकार है चाहे वह किसी भी जाति या धर्म का हो। वर्तमान में समाज का ढांचा ऐसा बन गया है कि जिसके पास साधन हैं वही शिक्षा और विशेषरूप से अच्छी शिक्षा प्राप्त कर सकता है। देश में तेजी से बढ़ रही जनसंख्या के कारण शिक्षा पाने वालों के अनुपात में अशिक्षित लोगों की संख्या अब भी बहुत ज्यादा है।

गुरुकुल के पवित्र वातावरण में वैदिक शिक्षा प्राप्त करने का समय अब नहीं रहा। देश में अंग्रेजों के आगमन के बाद से उनकी पाश्चात्य सभ्यता का प्रभाव हमारी संस्कृति के हर क्षेत्र पर पड़ा। जहां एक ओर बड़े शहरों में खोले गये मिशनरी स्कूल तथा उनके बाद इंगलिश माध्यम पब्लिक स्कूलों का बोलबाला रहा, वहीं गांव देहात में सरकारी स्कूल खोलने का जिम्मा सरकार ने उठा लिया। जनसंख्या बढ़ने के साथ-साथ आज शहरों में यह दशा है कि पब्लिक स्कूल गली-गली में दुकानों की तरह खुल गये हैं। किसी भी कालोनी के हर मोड़ पर आपको एक पब्लिक स्कूल का बोर्ड टंगा जरूर नजर आयेगा। इन बोर्डो को देख विदेश से आया कोई भी व्यक्ति एक बारगी यहां के शिक्षा स्तर को लेकर जरूर भ्रमित हो जाएगा।

देश के कुछ नामचीन स्कूलों के नाम लिए जाएं तो वहां पर पढ़ने वालों के सिर गर्व से ऊंचे हो जाते हैं। इन स्कूलों में जहां उच्च कोटि की शिक्षा दी जाती है वहीं बच्चों के व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास पर भी ध्यान दिया जाता है। ऐसे स्कूलों के विद्यार्थी अपने शिक्षकों को इसलिए सम्मान देते हैं कि उन्होंने जो सबक पढ़ाया वह उन्हें जीवन भर याद रहा या उनके पढ़ाने का तरीका इस प्रकार होता है कि वे उस चीज को जीवन भर याद रख सकेंगे। आज ऐसे शिक्षा संस्थानों की देश में कितनी संख्या है यह बताने की जरूरत नहीं है। ढाई या तीन वर्ष का बच्चा जब नर्सरी स्कूल में भेजा जाता है तो उसके अभिभावक के मन में ढेर सारी आशाएं होती हैं। क्योंकि बच्चे के जीवन की यह पहली सीढ़ी है। अत: नर्सरी व के. जी. क्लास पढ़ाने वाली शिक्षिकाओं को बहुत अहम भूमिका निभानी होती है। इन छोटी कक्षाओं में स्कूल का वातावरण बच्चों के लिए एक सुखद अनुभूति का होना चाहिए।

खेल-खिलौने तथा संगीत आदि के द्वारा मनोरंजन व शिक्षा का सही समन्वय होना नर्सरी स्कूलों के लिए अति आवश्यक है। खेल-खेल में जीवन के सच्चे आदर्शों व आधारभूत धारणाओं का इन छोटी कक्षाओं में बच्चों को ज्ञान कराना बहुत महत्वपूर्ण है लेकिन वास्तविकता इससे बहुत दूर है। वर्तमान में स्कूलों में जाते ही बच्चों को पेंसिल कापी पकड़ायी जाती है और शुरू हो जाता है अंग्रेजी वर्णमाला के नम्बरों का सफर। भारी बस्ते लादे छोटे-छोटे बच्चे सुबह ही निकल पड़ते हैं अपने जेलनुमा स्कूलों के लिए। सात से दस किताबों का बोझ उठाने वाले नर्सरी व के. जी. कक्षा के बच्चे गृह कार्य व स्कूल कार्य के बीच खोकर अपना अस्तित्व ही भूल जाते हैं। स्कूल जाते ही बच्चे के व्यक्तित्व के विकास के बदले उसके व्यक्तित्व का गतिरोध शुरू हो जाता है।

गली-गली में खुल रहे पब्लिक स्कूलों में भी होड़ मची हुई है। वे अपने यहां अधिक से अधिक पाठ्यक्रम रखने में अपनी शान समझते हैं। इन स्कूलों का मानना है कि जितने छोटे बच्चों को जितने ज्यादा विषय पढ़ायेंगे उसी से उनकी काबलियत का पता चलेगा। अनुभव व बहुदर्शिता द्वारा तथा मौखिक रूप से पढ़ाने के बजाय बच्चों को हमेशा पेंसिल व पेन पकड़ाकर लिखित कार्य कराने की पद्धति बच्चों के ज्ञान में किसी प्रकार से सहायक नहीं हो सकती। इन सबसे अधिक बच्चों के विकास में जो अवरोधक है वह है ‘टेस्ट संस्कृति’ वर्षभर में बारह बार टेस्ट व परीक्षा लेना बच्चों पर इतना ज्यादा बोझ डाल देता है कि उन्हें पूरे वर्षभर किताबों से सर उठाने की फुरसत नहीं होती। उधर अभिभावक भी इस होड़ में रहते हैं कि हमारा बच्चा किसी से पीछे न रह जाए इसलिए उसे ट्यूशन के अलावा घर पर भी पढ़ने का दुगुना दबाव डाल देते हैं। इस प्रकार बच्चे का इन दबावों के चलते वह विकास नहीं हो पाता जो कि होना चाहिए।

कक्षा में सदैव अव्वल रहने का तनाव भी बच्चे की सेहत के लिए घातक सिद्ध हो सकता है। परीक्षाओं के डर से बिना जाने समझे बच्चा हर विषय को रट लेता है और परीक्षा में लिखने के बाद उसके दिमाग से सब कुछ धुल जाता है। ऐसे में बच्चा समझ कुछ नहीं पाता केवल वह रट्टा पद्धति पर चलता रहता है। स्कूलों के अलावा पढ़ाई को अप्रिय बनाने में पाठ्यक्रम निर्धारित करने वाले नीति निर्धारकों का भी बहुत बड़ा हाथ है। माध्यमिक व उच्चत्तर माध्यमिक कक्षाओं की पाठ्य पुस्तकें देखकर इस बात का अंदाजा सहज ही लग जाता है। हिन्दी, अंग्रेजी जैसे साहित्यिक विषयों में न रस है और न विज्ञान व समाजशास्त्र की पुस्तकों में वह गहराई ही। ऊपर से होमवर्क और परीक्षा की तैयारियों में जुटे बच्चे न सूर और कबीर के दोहे याद कर पाते हैं और न ववर्थ का रहस्यवाद उन्हें समझ आ पाता है। शिक्षा की इस दयनीय अवस्था के लिए कुछ हद तक शिक्षक-शिक्षिकाओं को भी जिम्मेदार ठहराया जा सकता है। आज बच्चों को ज्ञान देने वाले समर्पित शिक्षकों का जैसे अकाल सा पड़ गया है।

अध्यापन का दायित्व शिक्षक पर होता है। वह ही शिक्षा स्तर को उन्नत करता है। वह चाहे तो बच्चे को शिक्षित कर सकता है और चाहे तो अपने अनापेक्षित व्यवहार से उसे ज्ञान विहीन बना सकता है। सरकारी व सहायता प्राप्त स्कूलों में अधिकांश शिक्षक कक्षाओं में समय से नहीं पहुंचते। कुछ शिक्षक विद्यालय तो आते हैं लेकिन वे हाजिरी लगाकर ही अपने कार्य की इतिश्री समझ लेते हैं। उन्हें विद्यार्थी और अध्यापन से कोई लेना देना नहीं है। ऐसे शिक्षक जो अध्यापन को अपना धर्म समझते हैं उनकी मजाक उड़ाई जाती है। इनके अलावा कुछ शिक्षक ऐसे भी हैं जो किसी तरह पाठ्यक्रम खत्म कराने पर तुले रहते हैं।

स्वतंत्रता पूर्व शिक्षक स्कूल या कालेज आने से पूर्व स्व अध्याय करके आते थे। इस प्रकार उन्हें कक्षा लेने में दिक्कत नहीं आती थी। आज का शिक्षक अपने आप को विषय विशेषज्ञ समझने लगा है। यही कारण है कि वह स्व अध्याय करके नहीं आता। कई बार कक्षा में बच्चे द्वारा पूछे गये प्रश्न का उत्तर वह अगले दिन बताने की बात कहकर प्रश्न को टाल देता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि शिक्षक स्व अध्याय करके नहीं आया है। भारत की वर्तमान शिक्षा प्रणाली ब्रिटिश प्रतिरूप पर आधारित है जिसकी नींव 1835 में रखी गयी थी।

शिक्षा स्तर को उन्नत करने के लिए पहला आयोग 1948-49 में राधाकृष्णन आयोग के नाम से गठित हुआ था। इसके बाद वर्ष 1952 में दूसरा आयोग गठित हुआ इस आयोग को मुदालियर आयोग का नाम दिया गया। इनमें राधाकृष्णन आयोग ने विश्वविद्यालयीय शिक्षा क्षेत्र में काम किया जबकि मुदालियर आयोग ने माध्यमिक शिक्षा पर काम किया। इसके बाद कई शिक्षा आयोग गठित किये गये। शिक्षा आयोगों की शुरूआत ही गलत तरीके से हुई थी क्योंकि पहला आयोग विश्वविद्यालयीय शिक्षा पर विचार करने के लिए गठित किया गया था। जबकि उसे प्राथमिक शिक्षा के लिए यदि गठित किया जाता तो शायद अगले आयोगों की सार्थकता बढ़ती। शिक्षा को व्यावसायीकरण करने की सिफारिश सबसे पहले कोठारी आयोग ने की थी। इस आयोग ने 1964-66 के बीच कार्य किया। देश में यदि शिक्षा को बढ़ावा देना है तो हमें अपनी शिक्षा नीति में भारी बदलाव लाना होगा।


शिक्षा पद्धति पर निबंध
(Essay on Education system)

प्रस्तावना:- शिक्षा एक व्यापक विषय है। जिसमे शिक्षा का विस्तार बहुत  बड़े स्तर पर है। हमारे यहाँ शिक्षा का महत्व बस यही है कि जिसने 5-10 किताबे स्कूल जाकर होने अध्यापक से पड़ ली तो समझा जायेगा की वो शिक्षित है। और जिसने जितनी अधिक स्कूल कॉलेज जाकर अपने अध्यापक से शिक्षा ली वो उतना ही अधिक शिक्षित है। आजकल लोगो का यही मानना है जो व्यक्ति अक्षरों से परिचित है वो शिक्षित है। और जिसको अक्षरों का ज्ञान नहीं वो हमारे यहां अशिक्षीत है। मतलव किताबी शिक्षा होना हमारे देश में आवश्यक माना जाता है। और जो यह योग्यता नहीं रखी कदापि शिक्षित नहीं कहलाता है। वास्तव में शिक्षा का संपर्क स्कूली पठन -, पाठन से ज्यादा नहीं है आजकल शिक्षा का अर्थ कोई अच्छी सी नौकरी करना है। अथवा जो अच्छे पेशे के द्वारा जीविका अर्जन करना समझा जाता है। क्योंकि इन सभी कामो मे लिखना पढ़ना अनिवार्य होता है। इसलिए आजकल इन कामो में सफल वाले व्यक्ति ही शिक्षित समझे जाते है।

हम शिक्षा पद्धति को दो रूपों में वर्णन करेंगे वैसे तो कई प्रकार की शिक्षा पद्धति है पर हम इसे दो वर्गो में बांटकर वर्णन करेंगे –
(प्राचीन शिक्षा पद्धति)
(,नवीन शिक्षा पद्धति)

प्राचीन शिक्षा पद्धति-

प्राचीन काल की शिक्षा पद्धति आज की शिक्षा पद्धति से अलग थी। आज की शिक्षा किताबो तक ही सिमित है। परन्तु प्राचीनकाल की शिक्षा किताबी ना होकर व्यवहारिक होती थी। पहले के छात्र अपना घर छोड़कर गुरुकुल के शांत माहौल में जाकर शिक्षा लेता था। साधारण सा और सिंपल जीवन यापन करना पड़ता था। कभी – कभी तो भिक्षा मॉंगकर अपने आश्रम में जाकर स्वम बनाकर खाना होता था। गुरुकुल की मर्यादा का पालन करना उनका दायित्व रहता था। गाय चराने गुरुकुल के सभी कार्य करना पड़ता था। और गुरु जी उन्हें व्यवहारिक ज्ञान देते थे। उस समय बहुत  महान – महान ऋषि थे जो ये शिक्षा प्रदान करते थे। उनमे से कुछ इस प्रकार है।

जैसे- धौम्य , च्यवन ऋषि , ऋषि द्रोणाचार्य , संदीपनी, वशिष्ट , विश्वामित्र , वाल्मीकि , गौतम , भरद्वाज , आदि ऋषियों के आश्रम प्रसिद्ध रहे। बौद्ध काल में बुद्ध, महावीर और शंकराचर्या , की परम्पराओं से जुड़े गुरुकुल जग प्रसिद्ध थे, प्रतेक गुरुकुल अपनी विशेषता के लिए प्रसिद्ध था। कोई धनुर्विधा सिखाने में कुशल था तो कोई वैदिक ज्ञान देने में कोई अस्त्र – शस्त्र सीखने में तो कोई ज्योतिष और खगोल विज्ञानं की शिक्षा देने में निपुण था , जैसा की आजकल इंजीनियरिंग कॉलेज है , बस वैसे ही 1850 तक भारत में गुरुकुल की प्रथा चलती आ रही थी। परन्तु मकोल द्वारा अंग्रेजी शिक्षा के संक्रमण के कारण भारत की प्राचीन शिक्षा व्यवस्था का अंत हुआ और भारत में कई गुरुकुल तोड़ा गए और उनके स्थान पर कान्वेंट और पब्लिक स्कूलों ने ले लिया था।

नवीन शिक्षा पद्धति

हमारे देश में राष्टीय शिक्षा निति 1986 में बनाई गई थी। और 1992 में संशोधित हो गई थी। तबसे लेकर अब तक इस निति में बदलाव हुए इसकी कुछ विशेषताएं है

(1) बचपन की देखभाल
(2) शिक्षा का अधिकार
(3) स्कूल परीक्षा में सुधार
(4) शिक्षक प्रबंधक
(5) शिक्षा के क्षेत्र में आई .सी.टी.
(6) व्यवसाइक शिक्षा और प्रशिक्षण
(7) विकलांग शिक्षा
(8) प्रौढ़ शिक्षा
(9) रुक जाना नहीं

इस प्रकार अगर शिक्षा के क्षेत्र में कई बदलाव किये गए है, सरकार चाहती है की हमारे देश में कोई भी व्यक्ति अशिक्षित ना हो उसके लिए उसने कई नीतियों का कर्यवरण किया है , इसमें अभी हाल ही में रुक जाना नहीं एक निति बनाई जिसमे उन क्षात्रो के लिए है जो किसी न किसी कारन अपनी पढ़ाई बिच में ही छोड़ देते है या परीक्षा पास नहीं कर पाते है।

सन् 1964 – 1975 तक शिक्षा संम्बधी आयोग का गठन किया गया जिसमे 10+2+3 1986 में शिक्षा पद्धति लागू की गई इसे ही हम नई वर्तशिका पद्धति कह सकते है .इसमें कई पूर्वकालीन शिक्षा संम्बधी विषमताओं को दूर करने का प्रयास किया गया है और नई शिक्षा नीतियों पर प्रकाश डाला गया है .जो काफी हद तक सफल भी है .

उप संहार

यदि देखा जाये तो हमारे देश में चाहे कितने भी बदलाव किये गए हो। पर शिक्षा पद्धति प्राचिन भी योग्य थी और नवीन भी जहाँ प्राचीन पद्धति में भारत विशवगुरु कहलाता था। विद्वानो ने शिक्षा को प्रकाशस्त्रोत , अंतर्दृष्टि , अंतर्ज्योति , ज्ञानचक्षु और तीसरा नेत्र आदि उपनामो से विभूषित किया है। उस युग की ये मान्यता थी की जिस प्रकार अंधकार को दूर करने के लिए प्रकाश की आवश्यकता होती है। उसी प्रकार व्यक्ति के सब संशयो और भर्मो को दूर करने के लिए शिक्षा आवश्यक है। उसी प्रकार नवीन शिक्षा पद्धति में हमारा भारत 15 अगस्त 1947 को आज़ाद हुआ था। हमारे करणधारा का ध्यान नई शिक्षा प्रणाली पर गया। और उनके अनुसार ब्रिटिश शिक्षा प्रणाली हमारी शिक्षा प्रणाली के लिए अनुकूल नहीं थी। गांधी जी ने कहा की शिक्षा से बच्चे का शारीरिक , मानसिक और नैतिक शिक्षा से विकास करना है। तथा उन्होंने ब्रिटिश शिक्षा प्रणाली में सुधार किया और कई समितियों बनाई जो की शिक्षा को एक नया आयाम दे सके।

इस प्रकार अगर देखे तो जहाँ पुरानी पद्धति में छात्र को गुरुकुल में जाकर शांत माहौल में शिक्षा ग्रहण करता था। वही आज नवीन शिक्षा पद्धति में छात्र देश के बाहर जाकर शिक्षा प्राप्त करके अपने देश में उसका प्रयोग करता है। इस प्रकार पहले के गुरु हो या आज के शिक्षक दोनों का ही मकसद अपने शिष्यों को अच्छी शिक्षा देना तथा अच्छा ज्ञान देना है। उनका एक ही लक्ष होना चाहिए की उनका छात्र अच्छा ज्ञान अर्जित कर सके शिक्षा देने का कोई भी प्रकार हो चाहे वो नवीन पद्धति हो या प्राचीन पद्धति मकसद तो बस एक ही होना चाहिए अच्छी शिक्षा। महत्वपूर्ण शिक्षा है ना की कुछ ओर।

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