शिक्षा पद्धति पर निबंध (Essay on Education system)

प्रस्तावना

शिक्षा एक व्यापक विषय है .जिसमे शिक्षा का विस्तार बोहोत बड़े स्तर पर है .हमारे यहाँ शिक्षा का महत्व बस यही है कि जिसने 5-10 किताबे स्कूल जाकर होने अध्यापक से पड़ ली तो समझा जायेगा की वो शिक्षित है .और जिसने जितनी अधिक स्कूल कॉलेज जाकर अपने अध्यापक से शिक्षा ली वो उतना ही अधिक शिक्षित है .आजकल लोगो का यही मानना है जो व्यक्ति अक्षरों से परिचित है वो शिक्षित है .और जिसको अक्षरों का ज्ञान नहीं वो हमारे यहां अशिक्षीत है .मतलव किताबी शिक्षा होना हमारे देश में आवश्यक माना जाता है .और जो यह योग्यता नहीं रखो कदापि शिक्षित नहीं कहलाता है .वास्तव में शिक्षा का संपर्क स्कूली पठन -, पाठन से ज्यादा नहीं है आजकल शिक्षा का अर्थ कोई अच्छी सी नौ करना है .अथवा जो अच्छे पेशे के द्वारा जीविका अर्जन करना समझा जाता है .क्युकी इन सभी कामो मे लिखना पढ़ना अनिवार्य होता है .इसलिएआजकल इन कामो में सफल वाले व्यक्ति ही शिक्षित समझे जाते है .

हम शिक्षा पद्धति को दो रूपों में वर्णन करेंगे वैसे तो कई प्रकार की शिक्षा पद्धति है पर हम इसे दो बर्गो में बाटकर वर्णन करेंगे .
(प्राचीन शिक्षा पद्धति)
(,नवीन शिक्षा पद्धति)

प्राचीन शिक्षा पद्धति

प्राचीन काल की शिक्षा पद्धति आज की शिक्षा पद्धति से अलग थी .आज की शिक्षा झा किताबो तक ही सिमित है .परन्तु प्राचीनकाल की शिक्षा किताबी ना होकर व्यवहारिक होती थी .पहले के छात्र अपना घर छोड़कर गुरुकुल के शांत माहौल में जाकर शिक्षा लेता था .साधरण सा और सिंपल जीवन यापन करना पड़ता था .कभी – कभी तो भिक्षा मॉंगकर अपने आश्रम में जाकर स्वम बनाकर खाना होता था .गुरुकुल की मर्यादा का पालन करना उनका दाइत्व रहता था .गाये चराना गुरुकुल के सभी कार्य करना पड़ता था .और गुरु जी उन्हें व्यवहारिक ज्ञान देते थे .उस समय बोहोत महान – महान ऋषि थे जो ये शिक्षा प्रदान करते थे .उनमे से कुछ इस प्रकार है .

जैसे ,धौम्य ,च्यवन ऋषि ,ऋषि द्रोणाचार्य ,संदीपनी,वशिष्ट ,विश्वामित्र ,वाल्मीकि ,गौतम ,भरद्वाज ,आदि ऋषियों के आश्रम प्रसिद्ध रहे .बौद्धकाल में बुद्ध,महावीर ,और शंकराचर्या ,की परम्परा से जुड़े गुरुकुल जग प्रसिद्ध थे,प्रतेक गुरुकुल अपनी विशेषता के लिए प्रसिद्ध था .कोई धनुर्विधा सिखाने में कुशल था तो कोई वैदिक ज्ञान देने में कोई अस्त्र – शस्त्र सीखने में तो कोई ज्योतिष और खगोल विज्ञानं की शिक्षा देने में निपुण था ,जैसा की आजकल इंजीनियरिंग कालेज ्स कालेज है ,बस वैसे ही .1850 तक भारत में गुरुकुल की प्रथा चलती आ रही थी .परन्तु मकोल द्वारा अंग्रेजी शिक्षा के संक्रमण के कारण भारत की प्राचीन शिक्षा व्यवस्था का अंत हुआ और भारत में कई गुरुकुल तोड़े गए और उनके स्थान पर कान्वेंट और पब्लिक स्कूलों ने ले लिया था .

नवीन शिक्षा पद्धति

हमारे देश में राष्टीय शिक्षा निति 1986 में बनाई गई थी .और1992 में संसोधित हो गई थी .तबसे लेकर अब तक इस निति में कईदलाव हुए इसकी कुछ विशेषताएं है
(1)बचपन की देखभाल
(2)शिक्षा का अधिकार
(3)स्कूल परीक्षा में सुधार
(4)शिक्षक प्रबंधक
(5)शिक्षा के क्षेत्र में आई .सी.टी.
(6)व्यवसाइक शिक्षा और प्रशिक्षण
(7),विकलांग शिक्षा
(8),प्रौढ़ शिक्षा
(9),रुक जाना नहीं

इस प्रकार अगर शिक्षा के क्षेत्र में कई बदलाव किये गए है ,सरकार चाहती है की हमारे देश में कोई भी व्यक्ति अशिक्षित ना हो उसके लिए उसने कई नीतियों का कर्यवरण किया है ,इसमें अभी हाल ही में रुक जाना नहीं एक निति बनाई जिसमे उन क्षात्रो के लिए है जो किसी न किसी कारन अपनी पढ़ाई बिच में ही छोड़ देते है या परीक्षा पास नहीं कर पाते है ,ये निति उनके लिए ही बनताकि वो अपनी हिम्मरके नहीं बैठे और अपनी शिक्षा आगे भी प्राम्भ कर की हर मान कर रुक जाए

इस्रकार शिक्षा किसी राष्ट अथवा समाज का माप दंड हराष्ट शिक्षा को जितना अधिक पसाहन देगा वो उतना ही प्रगतिशील बनेगा .इसप्रकार किसी भी राष्ट पर निर्भर है .की वो अपने देश के नागरिक पर किस प्रकार की बौद्धिक जागृति लाना चाहता है .सभी का बुनियादी शिक्षा के प्राम्भिक लक्षय में ही सफलता मिली है .स्वतंत्रता पूर्व की शिक्षा पद्धति में परिवर्तन लाते हुए प्राथमिक शिक्षा को चौथी से पांचवी तक किया है ..
सन् 1964 – 1975 तक शिक्षा सम्बन्धी आयोगों का गठन किया गया जिसमे 10+2+3 1986 में शिक्षा पद्धति लागु की गई इसे ही हम नई वर्तशिका पद्धति कह सकते है .इसमें कई पूर्वकालीन शिक्षा सम्बन्धी विषमताओं को दूर करने का प्रयास किया गया है और नई शिक्षा नीतियों पर प्रकाश डाला गया है .जो काफी हद तक सफल भी है .

उपसंहार

यदि देखा जाये तो हमारे देश में चाहे कितने भी बदलाव किये गए हो .पर शिक्षा पद्धति प्राचिन भी योग्य थी और नवीन भी जहाँ प्राचीन पद्धति में भारत विशवगुरु कहलाता था .विद्वानो ने शिक्षा को प्रकाशस्त्रोत ,अंतर्दृष्टि ,अंतर्ज्योति ,ज्ञानचक्षु और तीसरा नेत्र आदि उपनामो से विभूषित किया है .उस युग की ये मान्यता थी की जिस प्रकार अन्धकार को दूर करने के लिए प्रकाश की आवशयकता होती है .उसी प्रकार व्यक्ति के सब संशयो और भर्मो को दूर करने के लिए शिक्षा आवशयक है . उसी प्रकार नवीन शिक्षा पद्धति में हमारा भारत 15 अगस्त 1947 को आज़ाद हुआ था .हमारे करणधारा का ध्यान नई शिक्षा प्रणाली पर गया .और उनके अनुसार ब्रिटिश शिक्षा प्रणाली हमारी शिक्षा प्रणाली के लिए अनुकूल नहीं थी .गांधी जी ने कहा की शिक्षा से बच्चे का शारीरिक ,मानसिक और नैतिक शिक्षा से विकाश करना है .तथा उन्होंने बिट्रिश शिक्षा प्रणाली में सुधार किया और कई समितियों बनाई जो की शिक्षा को एक नया आयाम दे सके .

इस प्रकार अगर देखे तो जहाँ पुरानी पद्धति में छात्र को गुरुकुल में जाकर शांत माहौल में शिक्षा ग्रहण करता था .वही आज नविन शिक्षा पद्धति में छात्र देश के बाहर जाकर शिक्षा प्राप्त करके अपने देश में उसका प्रयोग करता है .इस प्रकार पहले के गुरु हो या आज के शिक्षक दोनों का ही मकशद अपने शिष्यों को अच्छी शिक्षा देना तथा अच्छा ज्ञान देना है .उनका एक ही लक्ष होना चाहिए की उनका छात्र अच्छा ज्ञान अर्जित कर सके शिक्षा देने का कोई भी प्रकार हो चाहे वो नविन पद्धति हो या प्राचीन पद्धति मकशद तो बस एक ही होना चाहिए अच्छी शिक्षा .महत्वपूर्ण शिक्षा है ना की कुछ और ….