भारतीय जीवन में व्याप्त कुरीतियां

भारतीय जीवन में व्याप्त कुरीतियां

[Maladies prevalent in Indian life]

प्रस्तावना:- व्यक्ति से समाज बनता है और समाज से राष्ट्र का निर्माण होता है। इस प्रकार व्यक्ति का समाज पर प्रभाव पड़ता है और समाज का राष्ट्र पर प्रभाव पड़ता है। इसलिय किसी भी राष्ट्र की उन्नति में उस राष्ट्र के व्यक्ति ओर समाज की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। यह हम भलीभाँति जानते है कि व्यक्ति से समाज का महत्व अधिक होता है। इसलिए समाज अपने प्रतेक स्वरूप से अपने राष्ट्र को निरंतर प्रभावित करता रहता है । इस प्रकार राष्ट्र का विकास और हास दोनों, क्योंकि समाज के लिए दोनों उत्तरदायी  है । इसलिए अगर समाज पतनोन्मुख होगा, तो उसका समाज भी ऐसा ही होगा। अतएव किसी राष्ट्र के विकास के लिए उसके समाज का विकसित होना आवश्यक है।

भारतीय जीवन का वर्तमान स्वरूप:– हमारे देश का स्वरूप यहाँ की सामाजिक विषमताओं और कुरीतियों के कुपरिणाम स्वरूप बहुत अधिक दुःखद ओर क्रूर बन गया है। आज भारतीय जीवन विभिन्न प्रकार की सामाजिक कुरूतियों से संकटग्रस्त हो चुका है। आज भारतीय जीवन मे अनेक प्रकार की सामाजिक अव्यवस्था – वर्णव्यवस्था , अंधविश्वास, जातिवाद, सम्प्रदायवाद, क्षेत्रवाद, प्रांतवाद, भाषा-बोली वाद, दहेज-प्रथा, बाल-विवाह प्रथा, सती -प्रथा, आदि रूढिया ओर कुरीतिया फैल चुकी है। इससे सम्पूर्ण जीवन स्वरूप को मानो ग्रहण लग चुका है। इस प्रकार की कुरुतियों से देश और समाज के साथ-साथ हर व्यक्ति चिंतित ओर परेशान है। ये कुरुतिया किस प्रकार की है और इनके कुप्रभाव क्या और कैसे है। इस प्रकार के तथ्यों पर प्रकाश डालना हम यहाँ आवश्यक ओर समुचित समझ रहे है।

वर्ण व्यवस्था:- भारतीय जीवन मे वर्ण -व्यवस्था सबसे बड़ी सामाजिक कुरीति है। यह भी कहना कोई अतिश्योक्ति और संगत बात नही होगी कि सारी कुरुतिया वर्ण -व्यवस्था की ही कोख से उत्पन्न हूई है। हमारे भारतीय-जीवन मे वर्ण व्यवस्था का का जन्म बहुत प्राचीन है। यह एक ऐसी मनुवादी सामाजिक व्यवस्था है। जिसमे न्याय और औचित्य पर कोई ध्यान नही दिया गया है। इस व्यवस्था के अनुसार हमारे समाज की चार वर्ण-व्यवस्थाये है। ब्राह्मण, क्षत्रिय , वैश्य और शुद्र। ब्राह्मण को सर्वश्रेष्ठ बतलाते हुए कहा गया – “जन्मना जायते शुद्र:ससंस्करात:”। अर्थात जन्म से हर व्यक्ति शुद्र होता है और संस्कारों से ही वह द्विज अर्थात ब्राह्मण बनता है। जन्म के आधार पर स्वीकार की जाने वाली वर्ण व्यवस्था ने भारतीय जीवन को बहुत ही अधिक हानि पहुचाई है। इस कुप्रथा के कारण ही एकलव्य, कर्ण आदि महापराक्रमीयो ओर महावीरों को बार-बार  उपेक्षित ओर निन्दनीय जीवन जीना पड़ा था। भारतीय वर्ण -व्यवस्था ने चार वर्णों ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के भेदभाव की शक्तिशाली जंजीरो को जकड़ करके जीवन कि श्रेष्ठता ओर पवित्रता को बहुत धूमिल कर दिया ।

असमानता ओर उपेक्षा पूर्ण भाव:- भारतीय जीवन मे स्थापित हुई वर्ण व्यवस्था ने समाज मे नारी के प्रति असमानता ओर उपेक्षापूर्ण भावों को अंकुरित-पल्लवित किया है। वास्तव में आज भारतीय समाज मे नारी को न्याय नही मिलता है। उसे मात्र योग्या के रूप में देखा और समझा गया है। ‘यत्र नार्यस्तु पूज्यते, रमन्ते तत्र देवता’ की सूक्ति अब कोई न सुनने वाला है और न उसे महत्व देने वाला भी कोई नही है। ऐक नारी के प्रति घोर उपेक्षापूर्ण ही नही, अपितु उसके प्रति पशुतापूर्ण व्यवहार भी निःसंकोचपूर्वक आये दिन किये जाते है। कहीं-कहीं तो उसे असमय ही दानवी तरीके से मार दिया जाता है। इसलिए नारी का आज स्वरूप विवशता  पूर्ण बन कर रह गया। संविधान में वह भले ही पुरुष के समानता की अधिकारिणी के रूप में मान्य हैै, लेकिन आज का पुरुष प्रधान समाज तो उसे केवल भोग्या के दासी के अतिरिक्त और कुछ नहीं समझता है।

अंध-विशवास:– हमारे जीवन मे अंध- विशवास का घनान्धकार खूब फैला हुआ है। जादू, टोना, मन्त्र-तंत्र-यन्त्र आदि के प्रति लोगो का खूब अंध-विशवास है। इस प्रकार के अंध-विशवास के अचूक प्रभाव से अधिकांश लोग जीवन भर नहीं बच पाते है। पुत्र प्राप्ति की कामना की पूर्ति हो या परीक्षा में सफल होने की कामना हो अथवा व्यपार- व्रद्धि हो या अन्य कोई सफलता की कामना हो। सबको पूर्ति के लिए विभिन्न्न प्रकार के देवता-देवी की पूजा पाठ या जादू-टोना, तंत्र-मंत्र-यन्त्र की शरण मे जा बलि अंध -विशवासी अपने प्राणों की बलि देने से भी नही डरते।

दहेज- प्रथा:- भारतीय जीवन में दहेज-प्रथा ने बखूबी जड़ जमा ली है। इस प्रथा के कुपरिणाम स्वरूप कहीं न कहीं वधुएं दहेज की बलि-वेदी पर चढ़ जाती है। वास्तव में इस प्रथा ने विवाह जैसे पूण्य-बन्धन को अपवित्र ओर कलंकित बना दिया है। आज दहेज रूपी दानव ने विवाहित युवतियों के सोभाग्य को धूमिल बनाने में कोई कसर नहीँ छोड़ा है। इसलिए आज की यह आवश्यकता है कि दहेज-प्रथा को समाप्त करने के लिए विभिन्न प्रकार के कठोर कानून ही न बनाये जाए अपितु उन्हें लागू करके इसको शह देने वालों को दंडित भी किया जाय। इसके लिए स्वयंसेवी-संगठन भी भूमिका निभा सकते है।

बाल-विवाह:-  भारतीय जीवन मे व्याप्त कुरुतिया में बाल-विवाह भी एक भयंकर कुरीति है। यो तो 21 वर्ष से कम उम्र के लड़के और 18 वर्ष से कम उम्र की लड़की का विवाह एक दंडनीय अपराध घोषित किया जा चुका है। फिर भी इसके उल्लंघन का रीति मानवता को चुनोती देने से बाज नही आते। शहरों की अपेक्षा गाँवो में बाल-विवाह की समस्या बहुधा दिखाई पड़ती है। बाल-विवाह से जहाँ शारीरिक और मानसिक विकास अधर में रह जाते है, वहीं जनसंख्या व्रद्धि की भयंकर समस्या बढ़ जाती है।

उपसंहार:- उपयुक्त कुरीतियों के अतिरिक्त हमारे भारतीय जीवन मे जातिवाद, क्षेत्रवाद, भाषावाद, प्रांतवाद, सतीप्रथा आदि ऐसी कुछ कुरीतियों है जिन्हें जड़ से समाप्त करके ही जीवन को सुखमय ओर खुशहाल बनाया जा सकता है। यह तभी सम्भव है। जब प्रशासन और नागरिक दोनों ही इन्हें निर्मूल करने के लिए कमर कस ले । अगर ऐसा नहीं किया जायेगा, तो ये कुरीतियों निशचय ही सुरसा के समान अपने अंदर हमारी सारी विकास प्रक्रिया और उसके आधार को चटपट निगल जाएंगी।

kavita yadav- writer 

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