गुरु नानक जयंती पर निबंध, लेख

गुरु नानक जयंती पर बड़े व छोटे निबंध – Long & Short Hindi Essay Writing on Guru Nanak Dev Ji .

#1. [Short Essay 600 words] गुरु नानक जयंती पर निबंध

प्रस्तावना : जब अधर्म का वास तथा दुष्टों द्वारा अन्याय तथा अत्याचारों का विकास होता है तो भगवान किसी महापुरुष को संसार का उद्धार करने के लिए स्वयं भेजते हैं। उनमें से गुरु नानकजी का नाम प्रथम पंक्ति में गिना जाता है। गुरु नानकदेव जी सिख धर्म के संस्थापक थे। सिख धर्म में गुरु नानक ने हिंदू धर्म के साथ प्यार और समानता के साथ सिख धर्म की नींव रखी थी। इन्होंने अपने विचारों के प्रचार के लिए पूरे भारत और भारत के बाहर के देशों की यात्रा की थी। कई गुरुद्वारों का निर्माण भारत ओर भारत के बाहर भी करवाया था। ताकि वे अपनी संस्कृति अपने धमॅ का फेलावा बढ़ा शके । सिख धर्म के पहले गुरु नानक जी के जन्म दिन को गुरुपवॅ या प्रकाश पवॅ के तोर पर मनाया जाता है ।

गुरुनानक जी का जीवन चरित्र:
अगर इतिहास को टटोला जाऐ तो 15 अप्रैल 1469 के आसपास कार्तिक शुक्ला की पूर्णिमा के दिन उनका जन्म हुआ था उनके पिताजी का नाम कालू चन्द जी और उनकी माता का नाम तृप्ता था । लाहौर से दूर एक छोटे से गाँव तलवंडी (जो पाकिस्तान का वतॅमान शेखपुरा जिला )मे उनका जन्म हुआ था।जिसे आब ननकाना साहिब के नाम से जाना जाता है । उनके पिता स्थानीय मुस्लिम मुख्यालय में पटवारी (राजस्व अधिकारी या अकाउंटेंट ) के रूप में कार्यरत थे।

बचपन मे उनके माता पिता ने उन्हें संस्कृत और फारसी सिखाई थी और वह चाहते थे कि वह कोई व्यवसाय या व्यापार में आगे बढ़े पर उनको हमेशा से धमॅ ओर आध्यात्मिकता में ज्यादा रुचि थी। वे ज्ञान में अपना अधिकांश समय समर्पित करते थे। इसी वजह से उनके पिता कालू चंद ने उनका विवाह करने का फैसला किया। 18 साल की उम्र में उनकी बीबी सुलखनी से शादी करवा दी। ओर शादी के बाद उनको दो बेटे हुऐ थे एक का नाम श्री चंद्र था ओर दुसरे का नाम लक्ष्मीदास।

उनको सांसारिक मोह माया में लगाने के लिए उनके पिता ने बहुत प्रयास किए। एक बार उनके पिताजी ने उनको कुछ रुपए दिए और व्यापार करने भेजा पर वहा उनको मार्ग में कुछ साधु मिल गए। गुरु नानक जी ने उन रुपयों से उन साधुओं को भोजन करवा दिया और वह अपने गांव वापिस लौट आए। जब उनके पिता ने उनसे पूछा कि वे बिना व्यापार किये क्यों लोट आऐ तो गुरु नानक जी ने बताया कि वह सच्चा सौदा कर आए हैं ।

नानक जी के समय में भारत सामाजिक और आध्यात्मिक संकटों का सामना कर रहा था। उनके अंदर महान आत्मा ज्ञान का भंडार भरा हुआ था। अपने अंदर के जलते धमॅ के दीपक को लेकर वह विश्व के अंधकार को मिटाने निकल पड़े। वह केवल अपने देश में ही नहीं किंतु विदेशों में भी जाकर आए थे जहां पर उन्होंने जन जन तक भगवान के पावन संदेश को पहुंचाया था और सत्य प्रेम का उपदेश भी दिया था । इतने अशांत समय पर गुरु नानकजी अध्यात्मिक गुरु के रूप में प्रकट हुए थे । उनके संदेश उस समय एक महान आशीर्वाद समान थे। उन्होंने पीड़ित मानवता के लिए सही रास्ता दिखाया। गुरु नानक जी बचपन से ही एक विचारशील और धर्म अध्ययन करने वाले व्यकित थे। इन्हें धार्मिक लोगों के साथ समय बिताना अच्छा लगता था।

वे निराकार भगवान की पूजा करते थे। उनका विश्वास था कि परमात्मा का अपना कोई भी रूप नहीं है। इस संसार में दिखने वाले सभी भगवान का स्वरुप है। इसलिए वे सभी को अपने अंदर ईश्वर को ढूंढने का उपदेश देते थे। वे मेहनत करने मे और बाट कर खाने में विश्वास रखते थे।
गुरु नानक जयंती के उपलक्ष पर सिखों के द्रारा सिखों के पवित्र ग्रंथ गुरु ग्रंथ साहिब को गुरुद्वारा में पढ़ी जाती है। दीपक जलाए जाते हैं और दोपहर का भोजन गुरुद्वारा में पकाया जाता है और सभी खड़ा प्रसाद का आनंद लेते हैं। मीठा प्रसाद जैसे सभी सिख समुदाय खड़ा प्रसाद कहकर संबोधित करते है और साथ में एक लाइन एक पंक्ति में बैठकर भोजन करते हैं, जिसे “लंगर” भी कहते हैं।

अपनी यात्रा के दौरान इन्होंने कई भजन और गीतों का निर्माण किया। गुरु नानकजी की सभी रचनाओं का आदि के ग्रंथ में आलेखन किया गया है। लगभग 25 वर्षों तक बड़े पैमाने पर यात्रा करने के बाद वे वापस अपने परिवार में जा मिले थे और फिर वही से उन्होंने अपने धर्म समानता और प्रेम का प्रचार किया। यह आदि ग्रंथ के पहले शब्द का श्रेय नानक जी को जाता है जिसमें उन्होंने “एक ओमकारा” “एक सतनाम ” यानी इशवर और भगवान एक ही है ।

उपसंहार :- गुरु नानक जयंती को गुरु पर्व या गुरुओं का उत्सव भी कहा जाता है। यह सीख लोगों का बहुत बड़ा पर्व माना जाता है। गुरु नानक जी अपने कई महान कार्यों के लिए जाने जाते हैं गुरु नानक जी ने विश्व भर मे सांप्रदायिक एकता , सच्चाई ,शांति ,सदभावना संदेश को फैलाया था।

#2. [Long Essay 1000 words] गुरु नानक जयंती पर निबंध / Guru Nanak Jayanti Essay in Hindi

यह बहुत बड़ी बात वास्तविकता है। कि संसार में अनेक साहसी, वीर, राजनीतिक व साधन संपन्न व्यक्ति हुए हैं। लेकिन मानवता की उखड़ती हुई जड़ का पुनर्स्थापना करने वाले बहुत ही विरले महापुरुष हुए हैं। ऐसे विरले महापुरुषों में श्री गुरु नानक देव का अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है।

श्री गुरु नानक देव का जन्म पूर्णिमा संवन्त 1626 ई. को लाहौर जिले के तलवंडी नामक गांव में हुआ था। वह स्थान आजकल “ननकान साहब” के नाम से जाना जाता है। जो अब पाकिस्तान में है। इनके पिता श्री कालू चंद बेदी तलवंडी के पटवारी थे। इनकी माता तृप्ता थी। वह बहुत ही साध्वी, दयालु ,शांत और धर्म परायण प्रकृति के थी। उनके व्यक्तित्व पर इनकी माता की प्रकृति का बहुत अधिक प्रभाव पड़ा।

बचपन से ही यह अत्यंत कुशाग्र बुद्धि संपन्न बालक है। इनके स्वभाव की यह भी विशेषता थी कि ये एकांतप्रिय और मननशील बालक थे। यही कारण था कि इनका मन शिक्षा या खेलकूद से कहीं अधिक आध्यात्मिक विषयों की ओर ही लगता था इस प्रकार यह बड़े हैं तेजस्वी, स्वच्छंद प्रिय, और असांसारिक व्यक्ति के रूप में आरंभ से ही दिखाई देने लगे। इनके पिताजी ने उद्योग करके इनको ग्रहस्थ जीवन में लाने के लिए कई उपाय किए। लेकिन वे सारे उपाय निष्फ़ल सिद्ध हुए।

यो तो गुरु नानक देव के जीवन के विषय में अनेक चमत्कारिक घटनाएं है। उनमें से एक यह भी अद्भुत घटना है कि एक बार उनके पिता ने उन्हें बीस रुपए दिए रुपए देते हुए उनसे कहा कि वे कोई लाभप्रद व्यवसाय करें नानक देव ने उन रुपयों को साधुओं को भोजन कराने में खर्च कर दिया। पूछने पर उत्तर दिया” साधुओं को भोजन कराना सबसे लाभप्रद व्यवसाय है” इससे उनके माता-पिता बहुत दुखी हुए। उनके जीवन की आश्चर्यजनक घटनाओं में से एक यह भी घटना है।

नानक देव दौलत खा की नौकरी करते समय एक बार अन्न तोल रहे थे। तेरा तक पहुंचने पर तेरा तेरा कहते-कहते अपनी सुधी खो बैठे । इससे उन्होंने ना जाने कितना अन्न तोल डाला। लेकिन वे तेरा से आगे नहीं बड़े। शिकायत पर उनके द्वारा तोले गए अन्न में कोई कमी नहीं आई। फिर भी नानक देव ने नौकरी से इस्तीफा दे दिया।

यो तो युवावस्था में ही गुरु नानक देव की शादी कर दी गई। लेकिन उनका मन ग्रहस्थ जीवन में अधिक समय तक नहीं लगा। कुछ ही समय तक उन्होंने ग्रहस्थ जीवन बिताया। उनके दो पुत्र श्रीचंद और लक्ष्मीचंद हुए। इसके बाद आप विरक्त होकर जंगल की ओर चल पड़े। जंगल की ओर जाते जाते यह लापता हो गए। तीन बार लौटने पर लोगों ने देखा कि नानक के मुंह से चारों और प्रकाश मंडल चमक रहा है। यह कहा जाता है कि इसी दिन इनको ईश्वर का साक्षात्कार हुआ था। इसी दिन इनको उपदेश देने का आदेश मिला था। आगे बढ़ते हैं जब वे सुल्तानपुर पहुंचे तब वहीं पर उनका शिष्य मर्दाना मिला। वह उनके अनेक यात्राओं में साथ-साथ रहा। उनके शिष्य हिंदू और मुसलमान दोनों ही थे।

गुरु नानक देव के जीवन की जितनी भी रोचक घटनाएं हैं वे सभी के सभी उनके द्वारा ही बनाए गए परिस्थितियों के फल स्वरुप है। वे इसलिए कि वे घटनाओं को आधार बनाकर उन्हें उपदेश के रूप में ढाल सके। एक बार नानक सैयदपुर गए। लालू नामक बढई के पास ठहरे। यहां के दीवान भग्गों मलिक थे। उन्हें जब यह सूचना मिली कि गुरु नानक देव लालू के यहां ठहरे हैं तो उन्होंने उन्हें अपने यहां आमंत्रित किया। बहुत आग्रह के बाद गुरु नानक देव भग्गो के घर गए। भग्गो ने उनसे पूछा महाराज आप एक महात्मा होकर भी मेरे यहां ना ठहर कर एक शुद्र के यहां क्यों ठहरे हैं। नानक देव ने दोनों के घर से रोटियां मंगाई। गुरु नानक देव ने एक हाथ से लालू के घर की रोटी और दूसरे हाथ से भग्गों के घर की रोटी को तोड़ा। सभी ने देखा कि लालू की रोटी से दूध गिर रहा है।ओर भग्गों की रोटी से खून। इसके द्वारा गुरु नानक देव ने यह स्पष्ट कर दिया कि धनीको का धन प्राय गरीबों का खून चूस कर एकत्र होता है। जबकि गरीबों का धन पसीने की कमाई है। लालू गुरुदेव का अनन्य भक्त था।

गुरु नानक के उत्तराधिकारी गुरु अंगद हुए। अंगद का पहले नाम लेना था। लहना अपने साथियों से गुरु नानक के विषय में अधिक सुन चुका था। इससे उसके मन में उनके प्रति अपार भक्ति भावना उत्पन्न हो गई थी। एक दिन वह करतारपुर आकर उनके श्री चरणों में गिर पड़ा। गुरु नानक देव ने उससे कहा। मैं तो तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा था अच्छा तुम्हारा नाम क्या है। लहना ने कहा लहना । गुरु नानक देव ने हंसकर कहा अच्छा तुम (लहना) अपना कर्ज ले लो।ऐसा कहकर गुरु ने अपनी शक्ति लहना को दे दी।उसे उन्होंने छाती से लगाकर कहा।आज से तुम्हारा नाम अंगद होंगा।

एक दिन गुरु नानक देव ने अंगद को आसन पर बैठा कर प्रणाम किया। लोगों ने इसके दो अर्थ लिए। पहला ये उन्होंने अंगद को गुरु बना दिया है। दूसरा यह कि वह अपने शरीर को अब त्याग कर देंगे। इसके बाद वे शांत रहने लगे। एक दिन उन्होंने कबीर दास की तरह यह चमत्कार दिखलाया । वे चादर ओढ़ कर लेट गए। बहुत देर बाद जब लोगों ने चादर उठाकर देखा तो वे नहीं थे। उनके दोनों ही प्रकार हिंदू मुस्लिम शिष्यों ने उस चादर के दो टुकड़े कर दिए। सिखों ने उनके नाम पर समाधि बनाई और मुसलमानों ने कब्र। गुरु नानक देव सन 1568 ई. में इस संसार को परित्याग कर दिया था।

यह तो गुरु नानक देव के शिक्षा अनेक और विविध प्रकार की हैं ।फिर भी उनकी शिक्षाओं की मुख्य बात यह है कि हमें अपनी प्रत्येक स्थिति में ईशवर का स्मरण करते रहना चाहिए। अहंकार को पालना ही सांसारिकता है।इससे सभी प्रकार के बंधन बढ़ते हैं ।परिश्रम करके रोटी कमाना और दूसरों को रोटी खिलाना ही सन्यास है। मृतु ही सत्य है और जीवन असत्य है ।इसे ही समझ करके हमें निरंतर मन की दीनता और जीवन की पवित्रता का अभ्यास करना चाहिए ।दूसरों में दोष ना देखकर अपने मन में ही देखना चाहिए।

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