प्रस्तावना:- मातृ दिवस मदर डे. (Mother’s Day) मातृ और दिवस से मिलकर बना है । मात्र का अर्थ होता है मां और दिवस का मतलब होता है दिन अर्थात मां का दिन जो पूरा माँ पर समर्पित होता है और इसे हर साल मई माह के दूसरे रविवार के दिन मनाया जाता है।

माँ: बच्चा का जब दुनिया में आता है, तो उसका पहला रिश्ता माँ से होता है। एक माँ शिशु को पूरे 9 महीने अपनी कोख में रखने के बाद असहनीय पीड़ा सहते हुए उसे जन्म देती है और इस दुनिया में लाती है। इन नौ महीनों में शिशु और माँ के बीच एक अदृश्य प्यार भरा गहरा रिश्ता बन जाता है। यह रिश्ता शिशु के जन्म के बाद साकार होता है और जीवन पर्यन्त बना रहता है। माँ और बच्चे का रिश्ता इतना प्रगाढ़ और प्रेम से भरा होता है, कि बच्चे को जरा ही तकलीफ होने पर भी माँ बेचैन हो उठती है। वहीं तकलीफ के समय बच्चा भी माँ को ही याद करता है। माँ का दुलार और प्यार भरी पुचकार ही बच्चे के लिए दवा का कार्य करती है। इसलिए ही ममता और स्नेह के इस रिश्ते को संसार का खूबसूरत रिश्ता कहा जाता है।

माँ जिसका स्थान कोई नही ले सकता है।
मां के बारे में क्या लिखूं। 
माँ तो हृदय का स्पर्श है। 
सब कुछ सह कर हमें हंसाए।
माँ ही मेरा रब है। 
आओ उसे एक दिन दे प्यारा। 
जिस पर उसका हक है…..

हमारी माँ हमारे लिए एक सुरक्षा कवच होती है क्योंकि वह हमें परेशानियों से बचाती है कोई परेशानी हो हमें पता तक नहीं चलने देती है और हम चाहे जो कुछ कहे सब सुन लेती है मातृ दिवस के दिन हमें हमारी मां को खुश रखना चाहिए उसे कोई दुख नहीं देना चाहिए हमें उनकी हर आज्ञा का पालन करना चाहिए । माँ हमें जीवन में एक अच्छा इंसान बनता है देखना चाहती है इसलिए उसकी हर बात को मानना हमारा कर्तव्य।

मातृ दिवस या मदर डे(Mother’s Day) की शुरुआत

मदर डे या मातृ दिवस वेस्ट वर्जीनिया में एना जोविस द्वारा समस्त माता और उनके गौरवमई मातृत्व के लिए तथा विशेष रूप से पारिवारिक और उनके परस्पर संबंधों को सम्मान देने के लिए आरंभ किया गया था । कुछ विद्वानों का मानना है कि यह ग्रीस से आरंभ हुआ है कहा जाता है कि पहले स्यबेले ग्रीक देवताओं की माँ थी । उनके सम्मान में यह दिवस मनाया जाता था।

माँ और हमारा नाता/रिस्ता 

एक बच्चे को जब एक माँ जन्म देती है तो उसका पहला रिश्ता मां के साथ बनता है ।और वह केवल प्यार और स्नेह का होता है एक माँ शिशु को पूरे 9 माह शिशु को अपनी कोख में रखने के बाद एक असहनीय पीड़ा को सहकर बच्चे को जन्म देती है। और वह शिशु को इस दुनिया में लाती है इतने महीने में माँ और शिशु का एक अद्रश्य प्यार भरा रिश्ता बन जाता है । और वह साकार उसके जन्म के बाद ही होता है और उसके पूरे जीवन पर्यन्तर बना रहता है ।माँ और बच्चे का स्नेह और प्यार जीवन में कोई और नहीं समझ सकता । यहां तक कि देवताओ ने भी माँ को सर्वोपरि कहा है। माँ बच्चे का वी कवच है ज जो स्वम तो सारे दुख सह लेती है पर अपने बच्चे पर आंच तक नही आने देती है।

स्कूल में मातृ दिवस

मातृ दिवस का आजकल हमारे भारत देश में भी प्रचलन बढ़ रहा है स्कूल कॉलेज में मातृ दिवस का आयोजन बहुत ही उल्लास के साथ मनाया जाता है इसका असर आजकल स्कूलों में दिखने लगा है और उसको मैं एक बड़ा कार्यक्रम आयोजन किया जाने लगा है इस दिन बच्चे स्कूल में बहुत सी तैयारी करते हैं जिसमें शिक्षक उनकी मदद करते हैं उत्सव मनाया जाता है ,कविता, भाषण इत्यादि तैयार किया जाता है स्कूल की तरफ से सभी बच्चों की मां को निमंत्रण कार्ड भेजा जाता है ।और सभी की मां भी बच्चों के साथ में कविता पाठ ,नृत्य भाषण ,नाटक ,में हिस्सा लेती है और अपनी प्रतिभा दिखाती हैं। माँये अपनी तरफ से स्कूलों में पकवान लेकर जाती हैं जिसे सभी मिलकर खाते हैं इस प्रकार यह दिन पूरी तरह से स्कूल के मध्य माँ और बच्चों पर ही केंद्रित होता है।

मातृ दिवस या माँ को देवता तक मानते हैं

मातृ दिवस को देवता तक मानते है इस हेतु में आप को एक कथा सुनाती हु।वो इस प्रकार है । एक बार की बात है सभी देवता बहुत मुश्किल में थे । में सभी देवता गण शिव जी की शरण में अपनी मुश्किलें लेकर गए । उस समय भगवान शिव जी के साथ भगवान गणेश और कार्तिकेय जी भी बैठे थे । देवताओ की मुश्किल को देखकर शिव जी ने गणेश जी और कार्तिक से उनकी मदद मांगी और एक प्रतियोगित करवाई उनके अनुसार जो सबसे पहले पृथ्वी की परिक्रमा करेगा वही देवताओ की मुश्किलों को दूर करेगा कार्तिकेय जी तो अपना वाहन लेकर निकल गए पृथ्वी की परिक्रमा करने , गणेश जी आए और उन्होंने अपने पिता शिव जी और माता पार्वती के पास गए और उनकी सात परिक्रमा करने लगे उन से उनकी माँ पार्वती जी ने पूछा कि पुत्र तुमने ऐसा क्यों किया तब गणेश जी ने कहा कि माता-पिता में ही पूरा संसार होता है तो मैं पृथ्वी की परिक्रमा क्यों करूं मेरा तो पूरा संसार ही उनके चरणो में है ।इस प्रकार जब देवता तज अपने माता पिता को इतना महत्व देते हैं तो हम आम इंसानों को भी अपने माता पिता के चरणों में ही स्वर्ग समझना चाहिए।

“मातृ दिवस” या “माँ” पर दोहे

# जब तक माँ सिर पै रही बेटा रहा जवान।
उठ साया जब तै गया, लगा बुढ़ापा आन॥

# माँ सपने में आ मुझे, पूछे मेरा हाल।
दूजी दुनिया में गई, फिर भी मेरा ख्याल॥

# जीवन पूरा ला दिया, पाला सब परिवार।
आज उसे मिलती नहीं, घर में रोटी चार॥

# जीवन भर देती रही, जी भर जिसे दुलार।
माँ अपनी को दे रहा, बेटा वही उधार॥

# माँ से बढ़कर कब हुआ, कोई और मुकाम !
चाहे आवें साथ मे, मिल कर देव तमाम !!

# माँ के दिल को पढ लिया,जिसने भी इंसान !
नही जरूरी बाँचना,…गीता और कुरान !!

# नैनन में है जल भरा, आँचल में आशीष।
तुम-सा दूजा नहि यहाँ, तुम्हें नवायें शीश।।

# कंटक सा संसार है, कहीं न टिकता पाँव।
अपनापन मिलता नहीं, माँ के सिवा न ठाँव।।

# रहीं लहू से सींचती, काया तेरी देन।
संस्कार सारे दिए, अदभुद तेरा प्रेम।।

# रातों को भी जागकर, हमें लिया है पाल।
ऋण तेरा कैसे चुके, सोंचे तेरे लाल।।

# स्वारथ है कोई नहीं, ना कोई व्यापार।
माँ का अनुपम प्रेम है, शीतल सुखद बयार।।

# जननी को जो पूजता, जग पूजै है सोय।
महिमा वर्णन कर सके, जग में दिखै न कोय।।

# माँ तो जग का मूल है, माँ में बसता प्यार।
मातृ-दिवस पर पूजता, तुझको सब संसार।।

प्रस्तावना
इस प्रकार माँ हम आम इंसानों के अलावा भगवान तक पूजनीय माँ का स्थान कोई नहीं ले सकता है । माँ ईश्वर तुल्य होती है और उसी को एक स्थान दिलाने के लिए मातृ दिवस बहुत ही अच्छा दिन है। जिस दिन मां को महत्व और उनके प्यार को हमें एक महत्वपूर्ण स्थान देते हुए पूरा दिन उनके साथ उनके नाम कर देना चाहिए । माँ के लिए उनकी चरणों में शीश नवाने तथा चरण स्पर्श का नमन का दिन है मात्र दिवस या (मदर डे)

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