[Monday, 3 August] रक्षाबंधन (कच्चे धागों का पक्का बंधन) 

मेरी पहली रेल यात्रा पर निबंध

ज़िन्दगी में  रेल   यात्रा करना हर किसी को रोमांच से भर देता है । हम हमेशा कामना करते है कि हमारी यात्रा सुखमयी हो । भारत की लगभग नब्बे फीसदी लोग रेल से सफर करते है । मेरी प्रथम रेल यात्रा मेरे लिए यादगार है । मैं इसे कभी नहीं भूल सकती हूँ। वह यात्रा मेरे लिए स्मरणीय अनुभव है । मैं महज़ 9 साल की  थी जब मैंने अपनी प्रथम रेल यात्रा की थी । मैं रेलवे स्टेशन जाने के लिए बड़ी उत्सुक थी । मैं अपने पापा , मम्मी के साथ रेलवे स्टेशन पहुंची थी । बहुत सारे कुली रेलवे प्लेटफार्म पर आवाज़ लगा रहे थे । पापा ने एक कुली को बुलाकर ट्रैन में सामान रखने के लिए कहा था । ट्रैन रेलवे प्लेटफार्म पर खड़ी थी ।मैं गुवाहाटी से हावड़ा जा रही थी । ट्रैन की बोगी में घुसकर पापा मम्मी ने सामान अंदर रखा और मैं खिड़की के पास वाले बर्थ पर जाकर बैठ गयी ।

ट्रैन के खिड़की के बाहर मैंने खूबसूरत दृश्य देखा जैसे पहाड़ , पेड़ ,पौधे ,हर -भरे लहलहाते खेत भी देखे ।  मेरा  मन ख़ुशी से झूम उठा और मां न मुझे कहा कि मुझे अपना हाथ ट्रैन के खिड़की से  बाहर नहीं निकालना है ।फिर जल्द ही मैं मां के पास जाकर बैठ गयी । पास ही के बर्थ में मेरी उम्र की एक  लड़की खेल रही थी । मैं उसके पास चली गयी और हम दोनों की अच्छी दोस्ती हो गयी और हम अपने गुड़ियों के साथ खेलने लगे थे ।फिर मां ने लंच के लिए आवाज़ लगायी । बीच बीच में ट्रैन की चूक चूक आवाज़ मेरे मन को भा जाती थी ।

उसके बाद कुछ खिलौने बेचने वाले लोग ट्रैन पर चढ़े थे । मैंने अपने पापा से ज़िद्द कि मुझे नयी गुड़िया दिला दे । पापा को मेरे जिद्द के समक्ष विवश होना पड़ा और उन्होंने खिलौने दिलवाये । खिड़की से बाहर का दृश्य बेहद खूबसूरत था । मैं बहुत उत्सुकता से चारो और देख रही थी । क्यों कि यह रेल यात्रा मेरे लिए प्रथम थी और इसकी सारी मीठी यादें मेरे दिल के बेहद करीब है ।मेरे लिए यह सफर रोमांच से भरा हुआ था । खिड़की से बाहर की हरियाली बेहद आकर्षक थी और देखने वालों का मन मोह लेती थी ।मेरे बर्थ के पास जो लड़की थी उसका नाम रौशनी था । हम दोनों अंताक्षरी खेल रहे थे और उसके बाद हमने लूडो भी खेला था । शाम होने को आयी थी ट्रैन की खिड़कियों से ठंडी -ठंडी हवा आ रही थी और उसका आनंद हर कोई ले रहा था ।

फिर गरमा गर्म कचोरी और समोसे वाला ट्रैन में आ गया था । हमने मज़े से गरमा गर्म कचोरी खाये और पापा ने चाय भी मंगवाई थी । फिर माँ ने मुझे कहानियों के किताब पढ़ने के लिए दिए था और मैंने परियों और जादुई वाली कहानियां पढ़ी थी । मेरा मन उत्साह से भर चूका था । पापा  अखबार पढ़ने में ज़्यादा व्यस्त थे ।फिर रात होने को आयी और पापा ने ट्रैन पर ही रात के खाने का आर्डर दे दिया था । हमने रोटी , सब्ज़ी और मिठाई खायी थी । उसके बाद माँ ने बर्थ पर चादर बिछाई और तकिया लगा दिया और मुझे सोने के लिए कहा । मैं रौशनी के साथ मज़े कर रही थी ।

फिर रात बहुत हो गयी थी और मम्मी का कहना मानकर मैं सोने के लिए चली गयी । सुबह पांच बजे मेरी नींद खुली तो देखा पापा चाय की चुस्कियां ले रहे थे । हालांकि मैं बहुत छोटी थी लेकिन मैंने पापा से मांगकर थोड़ी चाय पी ली । सफर लम्बा था लेकिन ऐसा प्रतीत हो रहा था की पल भर में समाप्त हो गया ।

ट्रैन अपनी रफ़्तार से भाग रही थी । सफर में भूख बड़ी लग जाती है । फिर गरमा गर्म नाश्ता किया और इस बार थोड़ी मैंने कॉफ़ी भी पि ली ।

उपसंहार

 थोड़ी देर में ही ट्रैन अपने आखरी स्टेशन हावड़ा पहुँच रहा था । मन उदास था कि सफर का अंत इतनी जल्दी हो गया है लेकिन यह सफर मेरे लिया हमेशा यादगार रहेगा । ट्रैन अपने आखरी गंतव्य स्टेशन तक पहुँच गयी । पापा ने कुली बुलवाई और सामान लेने के लिए  उन्हें कहा । मुझे दुःख हो रहा था । लेकिन फिर मम्मी ने कहा ज़िन्दगी का हर सफर का अंत तो होता है । मुझे उदास नहीं होना चाहिए क्यूंकि ऐसे आगे हमे बहुत सी रेल यात्रा करने का मौका मिलेगा ।

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