गंगा सफाई कार्य योजना पर निबंध

गंगा सफाई कार्य योजना पर निबंध
गंगा योजना बनाम विकास नीति

Ganga scheme vs development policy

गंगा सफाई कार्य योजना एवं नमामि गंगे जैसी गंगा निर्मलीकरण की पहलों के अपेक्षित परिणाम क्यों नहीं मिल रहे हैं, क्या हमारी अनियोजित एवं अनियंत्रित विकास नीतियां गंगा सफाई के मार्ग में बाधक बनी हैं, जिनके चलते गंगा सफाई एवं विकास के मध्य द्वंद्व बढ़ा है। यदि विकास नीतियां गंगा सफाई में बाधक बनी हैं तो क्यों, क्या है इस समस्या का समाधान तथा क्या करना होगा, आदि बिन्दुओं को इस निबंध में चर्चा का विषय बनाया गया है।

गंगा योजना बनाम विकास नीति के द्वंद्व को समझने से पूर्व यह जान लेना उचित होगा कि गंगा है क्या और भारतीय जनमानस में गंगा की स्थिति क्या है। गंगा भारत के सीमा क्षेत्र के भीतर बहने वाली सबसे बड़ी नदी भर नहीं है, अपितु यह तो भारतवासियों की जनास्था का केन्द्रबिन्दु है। अपार विस्तार वाली गंगा अपने उद्गम से मुहाने तक अनेकानेक तीर्थों का सृजन करती है, मृतात्माओं को तारती है, तो अपनी जलराशि से असंख्य लोगों को तृप्त करती है, इसके जल से फसलें लहलहाती हैं, इसीलिए यह अन्न के अक्षय भंडार की अन्नपूर्णा भी है। लोकमंगल के प्रति सदैव समर्पित रहने वाली गंगा भारतीय कृषि संस्कृति की प्राण हैं, तो भारतवासियों के लिए मूल्यचेतना। सारतः हम यह कह सकते हैं कि हमारे देश में गंगा में एक बड़ा समाजशास्त्रीय अर्थ निहित है।

इसे विडंबना ही कहेंगे कि जो गंगा कभी अपनी अमृततुल्य जल धाराओं के लिए जानी जाती थी, आज वह गंदगी का पर्याय बन चुकी है। गंगा में बढ़ते प्रदूषण एवं गंदगी के कारण अब गंगा का जल आचमन के काबिल नहीं रहा। गंगा को गंदगी से उबारने के लिए ही गंगा सफाई की आवश्यकता महसूस की गई। सर्वप्रथम इस दिशा में हमारे स्व. प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने ध्यान दिया और उन्हीं की पहल पर वर्ष 1986 में पाँच सौ करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि से देश में गंगा सफाई कार्य योजना की शुरुआत की गई। गंगा सफाई कार्य योजना में विश्व बैंक ने भी आर्थिक मदद की। गंगा सफाई कार्य योजना से शुरु हुआ गंगा की कायाकल्प का सफर अब ‘नमामि गंगे’ तक पहुँच चुका है, किंतु गंगा की स्थिति इस दौरान बद-से-बदतर ही हुई है। गंगा गंदगी से कराह रही है।

यह एक यक्ष प्रश्न है कि आज भी गंगा मैली क्यों बनी हुई है? वर्ष 1986 से अब तक गंगा की सफाई के लिए पैसा पानी से भी तेज बहाया गया, वैचारिक मंथन भी खूब हए और चिंतित व व्यापक परियोजनओं के दायरे में गंगा सफाई को लाया गया, तथापि गंगा न तो साफ हुई, न ही संरक्षित। गंगा न तो निर्मल ही बन पाई और न ही अविरल। गंगा की सफाई पर यह कहावत सटीक बैठती है कि मर्ज बढ़ता गया, ज्यों-ज्यों दवा की। ऐसे में गंगा सफाई योजना को लेकर यह प्रश्न उठना स्वाभविक है कि क्या हमारी विकास नीतियां गंगा सफाई में आड़े आ रही हैं?
यह कहना असंगत न होगा कि गंगा सफाई योजना की शुरुआत से लेकर अब तक गंगा योजना बनाम विकास नीतियों का द्वंद्व बढ़ा है। सच तो यह है कि यदि हमने विकास योजनाओं की पर्यावरण के अनुकूल बनाया होता, तो गंगा की यह दुर्दशा ही न होती। यह दुखद है कि हमने विकास के नाम पर ऐसी अनियंत्रित एवं अनियोजित नीतियां अपनाईं, जिसमें स्पष्ट रुप से पर्यावरणीय हितों की अनदेखी की गई।

अनियोजित एवं अनियंत्रित विकास योजनाओं के नाम पर हमने एक पवित्र एवं जीवनदायिनी नदी को कूड़ा-कचरा विसर्जित किए जाने की स्थली बना दिया। विकास के नाम पर अनियंत्रित अनियोजित औद्योगीकरण एवं नगरीकरण को बढ़ावा दिया गया, जिससे बढ़े हुए प्रदूषण की मार गंगा ही नहीं अपितु इसकी अनेक सहायक नदियों एवं देश की अन्य नदियों पर भी पड़ी। इस प्रकार गंगा का संकट दिनों दिन गहराता गया। विकास की अंधी दौड़ में हमने गंगा को विस्मृत कर दिया।

सच तो यह है कि हमारे नीति नियंताओं ने विकास का जो ढांचा तैयार किया, वह पूर्णतः प्रकृति-विनाश पर खड़ा है। इसने सिर्फ गंगा को ही मैला नहीं बनाया, बल्कि वनों एवं पर्वतों को भी बड़ी बेदर्दी से उजाड़ा। फलतः चौतरफा संकट गहराया। पर्यावरण क्षरण के कारण गंगा के ग्लेशियर कमजोर पड़े और इनके सिकुड़नेसिमटने से भी गंगा का संकट बढ़ा। यह एक ऐसा संकट है, जो गंगा की अस्तित्व पर ही भारी पड़ सकता है। आधुनिकता एवं प्रगति के दंभ में हम गंगा के इस संकट को बराबर नजरंदाज करते रहे। स्पष्ट है कि हम गंगा के लिए वह माता-भाव पैदा नहीं कर सके, जिसके चलते हम पुण्यतोया को ‘गंगा मइया’ कह कर संबोधित करते हैं।

हम विकास को तेज हवा देने में तो जुटे रहे, किंतु औद्योगिक एवं शहरी कूड़े-कचरे के निस्तारण और प्रबंधन की समुचित व्यवस्था करने में असफल रहे। इस असफलता का खामियाजा गंगा को भुगतना पड़ा। अनेक शहरों का औद्योगिक एवं शहरी कचरा सीधेसीधे गंगा में प्रवाहित करने से हमने तनिक भी गरेज नहीं किया। स्थिति इस हद तक बिगड़ी कि आधुनिकता एवं महानगरीय सभ्यतासंस्कृति का मैलापन गंगा के अस्तित्व पर ही भारी पड़ने लगा, जिसके चलते गंगा की पहचान गुम हो चली। घरों में गंगाजली में रखा जाने वाला जो गंगा जल वर्षों तक संदूषित नहीं होता था, उसे हमने क्रोमियम जैसे घातक रसायनों से इतना अधिक संदूषित एवं विषाक्त बना दिया कि वह आचमन योग्य भी न रह गया। प्रदूषण बढ़ने से गंगा की तलहटी में गाद बढ़ने से जहाँ नई तरह की समस्याएं उत्पन्न हुईं, वही जलीय जीवन की प्रतिकूल रुप से प्रभावित हुआ।

अनियंत्रित एवं अनियोजित विकास नीतियों के कारण हमने गंगा को कलुषित तो बनाया ही, इसे अविरल भी नहीं रहने दिया। विकास के नाम पर बनाए जाने वाले बांधों ने भी गंगा को बहुत क्षति पहंचाई है। इस रुप में भी हमने गंगा के प्रवाह को रोककर उसके अस्तित्व से खिलवाड़ किया। विकास के जिन लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए ये बांध बांधे गए, वे भी पूरे नहीं हुए। इसे हम उत्तराखंड के टिहरी बांध के उदाहरण से समझ सकते हैं। बिजली पैदा करने के लिए टिहरी बांध बनाकर गंगा के प्रवाह का रोका गया, किंतु यह निर्धारित लक्ष्य की एक चौथाई बिजली भी पैदा न कर पाया। इसके कुछ और भी दुष्परिणाम सामने आए। मसलन, गंगा का प्रवाह गड़बड़ाया, तो बांध के आस-पास के सैकड़ों गांवों में गंभीर जल संकट उत्पन्न हुआ। जिन ग्रामीणों के हितों को ध्यान में रखकर यह बांध बनाया गया, उन्हें ही अपना घर-बार छोड़कर मैदानी क्षेत्रों में पलायन करना पड़ा। स्वाभविकसा प्रश्न है कि ऐसा विकास किस काम का, जो न तो प्रकृति का ही भला कर सके औन न ही मनुष्य का?

अब वह समय आ गया है कि हम गंगा की सफाई को लेकर अपने दृष्टिकोण में बदलाव लाएं तथा इस बात की तह में जाएं कि क्यों गंगा सफाई कार्य योजना या नमामि गंगे जैसी कवायदों के अपेक्षित परिणाम सामने नहीं आ रहे हैं, जबकि इनमें व्यापक निवेश किया जा रहा है।

वस्तुतः गंगा सफाई के अपेक्षित परिणाम प्राप्त करने के लिए सर्वप्रथम हमें गंगा सफाई एवं विकास नीतियों के बीच के उस द्वंद्व को समाप्त करना होगा, जिसके कारण विरोधाभास की स्थिति बनी हुई है। एक तरफ तो हम गंगा सफाई पर पैसा पानी से भी तेज बहा रहे हैं, तो दूसरी तरफ हमारी विकास नीतियां ऐसी हैं, जो गंगा के प्राण लेने पर तुली हैं। हमारी अनियंत्रित-अनियोजित विकास नीतियों के कारण ही गंगा का संकट गहराया है, जिसकी तरफ हमने कभी ध्यान नहीं दिया।

गंगा सफाई के अपेक्षित परिणाम प्राप्त करने के लिए अब यह आवश्यक हो चुका है कि विकास की जो भी पहले हों, वे पर्यावरण के अनुकूल हों, साथ ही इनके क्रियान्वयन में पर्यावरण से जुड़े नियम-कायदों का पालन न सिर्फ कड़ाई से किया जाना सुनिश्चित किया जाए, बल्कि इनके उल्लंघन पर कठोर दंड की व्यवस्था भी की जाए। विकास योजनाएं बनाते समय इनसे होने वाले प्रदूषण के निस्तारण के समुचित बन्दोबस्त किए जाएं। औद्योगिक प्रदूषण का निपटान इस प्रकार हो कि ये नदी तक किसी भी रूप में न पहुंच पाएं। नगरीय विस्तार को भी सुरक्षित बनाते हुए ऐसे उपाय सुनिश्चित करने होंगे कि गंदे नाले नदियों से न मिलें। विकास के नाम पर गंगा के प्रवाह से की जा रही छेड़-छाड़ को भी रोकना होगा ताकि गंगा का प्राकृतिक प्रवाह बाधित न हो। ये प्रयास पूरी ईमानदारी एवं पारदर्शिता से इस प्रकार होने चाहिए कि इनमें भ्रष्टाचार की तनिक भी गुंजाइश न रहे। इसके लिए एक सशक्त निगरानी तंत्र को विकसित किया जाना भी अत्यंत आवश्यक है।

गंगा भारतवासियों की मूल्यचेतना है। यह वह रस-धारा है, जो हिमालय से फूटकर असंख्य भारतवासियों को तृप्त करती है। गंगा तो लोक हृदय की भाव-भूमि का पवित्र विस्तार है। इसकी यात्रा इस देश के सामूहिक मन की अंतर्यात्रा जैसी है। हमें इस संकल्प के साथ देश की भौगोलिक, भावनात्मक, सांस्कृतिक एवं मिथकीय एकता को आधार देने वाली गंगा को विकास की मार से बचाना होगा कि जल ही ब्रह्म है और रस ही जीवन है।

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