शतरंज पर निबंध

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खेल एक ऐसी क्रिया है जो व्यक्ति के शारीरिक विकास के साथ ही मानसिक विकास में भी सहायता करता है। परंतु यह आवश्यक नहीं है कि सभी खेल शारीरिक रूप से खेले जाएं, कुछ खेलों में मानसिक क्षमता का प्रदर्शन भी किया जाता है। ऐसे में इनडोर तथा मानसिक विकास में सहायक खेल है शतरंज।

आज हम आपको इस लेख के माध्यम से शतरंज के खेल विषय पर निबंध प्रस्तुत कर रहे हैं। इस निबंध के जरिए आपको शतरंज खेल से जुड़ी महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होगी।

“शतरंज खेल पर निबंध”

प्रस्तावना: प्राचीन काल से भारत से उत्पन्न होकर समस्त विश्व में फैलने वाला शतरंज का खेल खिलाड़ी को मानसिक रूप से शक्तिशाली बनाता है। चतुरंग खेल के नियमों को परिवर्तित करके ही शतरंज खेल का जन्म हुआ। आधुनिक काल में इसे चैस के नाम से भी जाना जाता है। इस खेल के अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर आयोजन तथा नियंत्रण हेतु वर्ल्ड चैस फेडरेशन तथा एसोसिएशन ऑफ चैस प्रोफेशनल जैसी अन्तर्राष्ट्रीय संस्थाएं बनाई गईं हैं।

शतरंज खेल का इतिहास: किवदंतियों के अनुसार, शतरंज के खेल का आविष्कार गुप्त काल में हुआ। शतरंज के खेल के आविष्कार के समय इसे चतुरंग खेल के नाम से जाना जाता था। हालांकि महाभारत में पांडवों तथा कौरवों के बीच चौसर का खेल खेला गया था। लेकिन इसके पश्चात् गुप्तकाल के राजाओं ने चौसर खेल में परिवर्तन की चाह के साथ शतरंज खेल की उत्पत्ति की। पांचवीं तथा छठी शताब्दी के समय से भारत में शतरंज का आगाज हुआ। इस खेल की उत्पति भारत से ही जानी जाती है। भारत में व्यापक रूप से बढ़ने के बाद यह खेल पारसी देश में प्रचलित हुआ। 9 वीं शताब्दी तक शतरंज का खेल यूरोप तथा रूस जैसे देशों में फैला। जिसके साथ ही यह खेल पूरे विश्व में फैलता चला गया।

शतरंज खेल का रूप: शतरंज खेल के अन्तर्गत 64 खानों से बना एक बोर्ड होता है। इस बोर्ड में 32 खाने काले रंग के तथा 32 खाने सफेद रंग के होते हैं। इस खेल के अन्तर्गत दो खिलाड़ी ही शामिल किए जाते हैं। दोनों खिलाड़ियों के पास बोर्ड में एक राजा, एक वजीर, दो हाथी, दो घोड़े, दो ऊंठ तथा आठ सैनिक मिलते हैं। खेल में चाल के दौरान कई मुहरों को चला जाता है। इस खेल में सफेद खाने के खिलाड़ी द्वारा खेल की शुरुआत की जाती है। इस खेल में समय की कोई अधिकतम सीमा निर्धारित नहीं की जाती है। शतरंज खेल के वैश्विक स्तर पर नियंत्रण हेतु इंटरनेशनल चेस फाउंडेशन का निर्माण किया गया। इसके साथ ही भारत में शतरंज खेल का नियंत्रण तथा प्रतियोगिता के आयोजन के लिए सन् 1951 में इंडिया चेस फाउंडेशन को स्थापित किया गया।

शतरंज खेल के नियम:

• शतरंज के खेल में 6 प्रकार के 32 मोहरे होते हैं। जिसमें से प्रत्येक खिलाड़ी के लिए 16। इन मोहरो की चाल एक दूसरे से अलग होती है। उसी के अनुसार खेल में मोहरों की चाल चली जाती है।
• खेल का लक्ष्य शह व मात होता है। लेकिन आवश्यक नहीं कि खेल इस लक्ष्य की पूर्ति पर ही समाप्त हो। खेल के बीच में कोई खिलाड़ी यदि अपनी हार मानकर खेल छोड़ता है, ऐसी स्थिति में खेल को खत्म किया जा सकता है।
• खेल के ड्रा होने पर भी खेल खत्म करने के कई तरीके होते हैं।
• विरोधी खिलाड़ी के मोहरे को काटने के अतिरिक्त चाले रिक्त स्थानों पर चली जाती हैं।
• काटे गए मोहरे को खेल से निकाल दिया जाता है और शेष खेल में वापस नहीं लिया जाता है।
• इस खेल में पियादे एकमात्र ऐसे मोहरे हैं जो अपनी सामान्य चाल से अलग चलते हैं।
• बादशाह और कीश्ती को एक साथ नहीं चला जा सकता है।

निष्कर्ष: शतरंज के खेल को फिलहाल ओलंपिक खेलों में शामिल नहीं किया गया है। लेकिन इस खेल के प्रति लोगों के लगाव से इस खेल के राष्ट्रीय स्तर, राज्य स्तर, जिला आदि स्तरों पर प्रतिस्पर्द्धाओं में आयोजन कराएं जाते हैं। कुछ विश्व प्रसिद्ध शतरंज खिलाड़ी जिन्होंने शतरंज के खेल में वैश्विक स्तर पर अपने देश का नाम रोशन किया। विश्वनाथन आनंद, दिव्येंदु बरुआ, बी. रवि कुमार, आरती रामास्वामी, पी.हरिकृष्ण आदि।

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