समय का बदलता स्वरूप

समय का बदलता स्वरूप पर निबंध

समय काल का ऐसा चक्र जो निरंतर बदलता रहता है समय को अंग्रेजी में तीन भागों में बांटा गया है भूतकाल, वर्तमान और भविष्य जो कार्य किया जा चुका है वह भूतकाल जो में किया जा रहा है वह वर्तमान और जो आने वाले दिनों में किया जाएगा व भविष्य काल कहा जाता है।

एक पुराना भजन है जिसकी आरंभ की दो लाइनें मैं यहां बताना चाहूंगी कि उठ जाग मुसाफिर भोर भई अब रैन कहां पर खो वत है जो जागत है सो पावत है जो सोवत है वह खोवत है अर्थात समय कभी भी किसी के लिए नहीं रुकता समय का स्वरूप हर क्षण बदलता रहता है और जो लोग इस बात को पहचानते हैं और कल की वजह आज में जीवन जीते हैं वही सफलता प्राप्त करते हैं यदि आप किसी भी सफल व्यक्ति से उसकी सफलता का राज पूछेंगे तो वह यहीं कहेगा कि उसने सही समय पर सही निर्णय लिया, आज हमें यहां इस बात का विश्लेषण करना है कि समय ने मनुष्य के जीवन मैं पहले से लेकर अब तक में क्या परिवर्तन किया है।

प्राचीन समय से यदि हम वर्तमान समय के परिवर्तन की चर्चा करें तो काफी बदलाव आया है वैज्ञानिक आविष्कारों ने लोगों के जीवन को सरल बना दिया है जब मनुष्य धरती पर आया था तो ना उसके पास पहनने को वस्त्र, खाने को भोजन और रहने को घर था परंतु धीरे-धीरे उसने छोटे-छोटे अविष्कार किया और अपना जीवन को कठिन से सरल बनाया और इस प्रकार समय का स्वरूप बदलने लगा।

यह बात तो मानव जीवन के आरंभ से जुड़ी हुई थी पर यदि हम आज कल की बात करें तो समय बहुत तेजी से बदल रहा है पहले लोग संयुक्त परिवार में रहते थे जहां बच्चों को माता-पिता के साथ दादा, दादी चाचा, बुआ का प्यार प्राप्त होता था पर गौर कीजिएगा अब समय बदल गया है अब लोग अकेले रहना पसंद करते हैं, पहले लोग खुश रहते थे तो स्वस्थ भी रहते थे पर आज समय बदल गया आज के लोग ना तो खुश है और ना ही स्वस्थ बीमारियों ने लोगों के परिवार में एक स्थाई सदस्य की तरह जगह बना ली है पहले भारत में लोगों की औसत आयु 80 वर्ष थी पर अब यह घटकर 65 वर्ष हो गई है।

समय ने अपना स्वरूप तो बदला है पर उसका प्रभाव लोगों के जीवन पर अच्छा या बुरा पड़ रहा है इस पर विचार करने की आवश्यकता है 200 वर्ष पहले तक हमारा देश भारत गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ था पर समय बदला और आज हम स्वतंत्र हैं आप दुख में हो या सुख में इससे समय को कोई फर्क नहीं पड़ता वह तो अपनी गति से चलता रहता है और कभी किसी के लिए नहीं रुकता मैं इस लेख का समापन अपनी स्वरचित कविता के माध्यम से करना चाहूंगी इस कविता में मैंने एक काल्पनिक दृश्य को दर्शाया है जिसमें समय अपनी प्रेयसी से संवाद कर रहा है और उसे अपनी महत्वता के बारे में बता रहा है तो वह संवाद कुछ इस प्रकार है:-

मैं समय हूं मुझको मत रोको,
मैं समय हूं मुझको मत रोको ना आने वाला हाथ प्रिए
यह जीवन है वीणा रूपी इसे बजा रहा बन तार प्रिए
चलता रहता हूं लगातार, चलता रहता हूं लगातार
बिन हारे थके हर बार प्रिए
गर जीवन में पाना है कुछ, गर जीवन में पाना है कुछ
ना करो मुझे बर्बाद प्रिए
मैं समय हूं मुझको मत रोक, मै समय हो मुझको मत रोको
ना आने वाला हाथ प्रिए।

जागृति अस्थाना लेखक

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