राष्ट्र निर्माण व साहित्य

यदि किसी राष्ट्र का साहित्य उन्नत व समृद्धशाली है तो वह राष्ट्र भी उन्नत तथा समृद्धशाली होगा और यदि वहां साहित्य का अभाव है, तो उस राष्ट्र का बने रहना मुश्किल होगा। साहित्य उन्नत व समृद्धशाली न होने से किसी भी राष्ट्र की आज नहीं तो कल संस्कृति, सभ्यता निश्चित ही नष्ट हो जायेगी। निर्जीव राष्ट्र चिरस्थायी नहीं रह सकता।

हमारा प्राचीन साहित्य, संसार के अन्य किसी राष्ट्र के साहित्य की अपेक्षा अधिक समृद्ध था। यही कारण है कि हमारे देश को विश्व के लोग जगद्गुरु कहते थे। विश्व के करीब-करीब सभी राष्ट्रों के लोग यहाँ शिक्षा ग्रहण करने आते थे। हम विद्या और बुद्धि, शक्ति और साहित्य में संसार के सिरमौर थे, अग्रगण्य और अग्रगामी थे। हमने सभी देशों की अज्ञानता नष्ट कर उन्हें ज्ञानलोक दिया और उनका मार्गप्रदर्शन किया था। विश्व हमें धर्मगुरु मानता था। यही कारण है कि उस समय इंग्लैंड और जर्मन निवासियों ने भारत आकर संस्कृत साहित्य का गहन अध्ययन किया। संस्कृत साहित्य का अक्षुण्ण कोष हमारे भारतवर्ष की अमूल्य निधि है। इसी उच्च कोटि के साहित्य के कारण हमारा राष्ट्र उन्नतिशील था।

संसार में सब चीजें परिवर्तनशील हैं, जो वस्तु आज है, कल वह उस अवस्था में नहीं रह सकती। समय बदल सकता है, समय के साथ-साथ मनुष्य की बुद्धि, विचार और उसके कार्यकलाप भी बदल जाते हैं। ऐश्वर्य, धनधान्य और अनन्त महिमा सम्पन्न भारतवर्ष का भाग्याकाश विदेशी आक्रान्ताओं से आच्छादित हो उठा। देश का सौभाग्य-सूर्य प्रभावहीन सा दृष्टिगोचर होने लगा। सामाजिक परिवर्तनों के साथ साहित्य की गुणवत्ता में भी अंतर आ जाता है। इसलिए जीवन के समाज साहित्य के मूलभूत मूल्य भी परिवर्तनशील हैं। सामाजिक परिवर्तन साहित्य में भी परिवर्तन लाते रहते हैं। किसी काल खण्ड या युग का साहित्य दूसरे युग व काल खण्ड से भिन्न होता है। यह परिवर्तन विषय वस्तु तक ही सीमित नहीं रहता बल्कि इसका प्रभाव अभिव्यंजना पर भी पड़ता है। इसका कारण साहित्यकार भी एक सामाजिक प्राणी है। समाज में रहते हुए वह अवश्य ही अपने सामाजिक वातावरण व परिस्थितियों से प्रभावित होता है।

यदि आप किसी राष्ट्र को अपना चिरस्थायी दास बनाना चाहते हैं तो आपको सर्वप्रथम उस राष्ट की जाति का साहित्य नष्ट करना होगा और साथ ही वहाँ की भाषा को नष्ट करना होगा। यदि आप किसी जाति की जातीयता और राष्ट्रीयता की भावनाओं को मूर्त के गर्भ में सुला देना चाहते हैं तो आप उस देश और जाति की अमूल्य निधि साहित्य को समाप्त कर दीजिए। हमारे देश में विदेशियों के अनेक आक्रमण हुए। नालन्दा और तक्षशिला के विश्व-प्रसिद्ध पुस्तकालय जला दिये गये। इसका परिणाम यह हुआ कि साहित्य के अभाव में हमारी राष्ट्रीयता विलुप्त सी हो गई। हम आश्रयहीन, निरालम्ब और असहाय बनकर मूक पशु की भाँति विदेशियों द्वारा किये जाने वाले अत्याचार और अन्याय सहन करते रहे।

समय ने करवट बदली। देश के लोगों में चेतना और स्फूर्ति फैली। जन-जीवन में जागरण का उद्घोष हुआ। विदेशी आक्रान्ताओं के विरुद्ध आत्म-संगठन के विचार लोगों के मानस सागर में हिलोरे लेने लगे, परिस्थितियों से विवश मृतप्रायः आर्य जाति ने फिर करवट ली और अंगड़ाई लेकर उठ बैठी। शिवाजी ने हिन्दुओं की रोटी और बेटी की रक्षा करने की शपथ ली, भूषण जैसे राष्ट्रकवियों का जन्म हुआ। भूषण ने अपनी अनेक मार्मिक उक्तियों द्वारा हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए शिवाजी को सचेत कर दिया और शिवाजी शत्रुओं से भिड़े भी लेकिन यह सब कुछ राष्ट्रीय जागरण का प्रभाव मात्र था। उस समय सबसे बड़ी समस्या भाषा की थी, क्योंकि समस्त देश की कोई एक भाषा नहीं थी। विभिन्न भाषी होने के कारण लोगों का संगठन दुर्लभ-सा प्रतीत हो रहा था। फिर भी सूर, तुलसी, दादू, कबीर, चैतन्य महाप्रभु, नानक आदि महापुरुषों ने भिन्न-भिन्न भाषाओं का आश्रय लेकर देश में सामाजिक और जातीय संगठन का सूत्रपात किया। इन महापुरुषों ने अपने साहित्य द्वारा मानवता की रक्षा की।

राष्ट्र निर्माताओं ने भयभीत जनता के हृदय में आत्मरक्षा और आत्मविश्वास को जागृत करते हुए स्नेह और संगठन का मार्ग प्रशस्त किया। जनता के हृदय में घर कर गई संकीर्ण विचारधाराओं को समाप्त कर संगठन का अमोघ यन्त्र प्रदान किया। तुलसी ने राम कथा द्वारा जनता को संगठित रहने तथा आततायी को समूल नष्ट कर देने का जो पाठ पढ़ाया वह अपने आप में अद्वितीय था। शक्ति, शील और सौन्दर्यपूर्ण राम जनता के दुख-सुख बन गए। रामचरित मानस ने विनाश के कगार पर खड़ी हिन्दू के विनाश को रोक दिया। मुसलमानों के अतिरिक्त अन्य जातियाँ जो भारतवर्ष में उपद्रवी बन कर आई थीं, इन महापुरुषों के प्रयत्नों और उपदेशों से प्रभावित होकर आर्यों के साथ मिल-जुल गईं।

देश में अंग्रेजों के पदार्पण ने भारतीय जनता में देश-प्रेम की भावना को और भी बढ़ा दिया। बावजूद इसके फिर भी यहां एक समस्या थी। यह समस्या थी देश में किसी भी भाषा का देशव्यापी प्रभाव न होना। भारतीयों की अनन्त साधनाओं, तपस्याओं एवं बलिदानों की पृष्ठभूमि में भारतीय साहित्यकारों का देश-प्रेम पूर्ण साहित्य था, जिसके फलस्वरूप देश विदेशियों से मुक्त हुआ। आज हम स्वतन्त्र हैं। देश की राष्ट्रभाषा के सिंहासन पर हिन्दी को प्रतिष्ठित किया जा चुका है। राष्ट्रभाषा के अभाव में राष्ट्रीय संगठन में जो बाधायें उपस्थित हो रही थीं अब वे समाप्त हो जाएँगी।

वर्तमान साहित्यकारों का कर्तव्य बनता है कि वे ऐसे साहित्य का निर्माण करें जिससे देश के आत्म-गौरव और गरिमा में और वृद्धि हो। देश का सर्वांगीण विकास और सामूहिक चारित्रिक पुनरुत्थान सत्साहित्य पर ही निर्भर करता है। आज साहित्यकार अपने कर्तव्य का पालन न करते हुए देशवासियों का ईमानदारी से पथ-प्रदर्शन नहीं कर रहे। यही कारण है कि देश का चारित्रिक विकास धीमा हो गया है, कर्त्तव्यहीनता और स्वार्थ-लोलुपता हर जगह देखने को मिलती है।

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