डॉलर v/s रुपए पर निबंध

जब से हमारा देश आजाद हुआ है। तब से लेकर अब तक डॉलर की कीमत रुपए के मुकाबले बढ़ती जा रही है। बता दें, रुपए की कीमत कई चीजों पर निर्भर करती है इसी कारण यह हर दिन बदलती रहती है, मगर इसके पीछे क्या कारण है। इस पर हम आज चर्चा करेंगे। आज हम इस पोस्ट में हम आपको डॉलर V/S रुपए पर निबंध लिखेंगे।


डॉलर और रुपए क्या है?


अमेरिका के free-market economy में, कीमतों को पैसे की यूनिट में व्यक्त किया जाता है। मौजूदा कानून के अनुसार, यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ अमेरिका के पैसे, डॉलर में व्यक्त किए जाते हैं। रुपए की बात करें, तो भारतीय रुपया भारत की राष्ट्रीय मुद्रा है। इसका बाज़ार नियामक और जारीकर्ता भारतीय रिज़र्व बैंक है। नए प्रतीक चिह्न के आने से पहले रुपए को हिंदी में दर्शाने के लिए ‘रु’ और अंग्रेजी में Re., Rs. और Rp. का प्रयोग किया जाता था।


डॉलर की रेट के घटने या फिर बढ़ने पर क्या होगा?


जब डॉलर का रेट घटता है, तो इसका मतलब है कि रुपए की कीमत बढ़ती है और इसी तरह इसके विपरीत भी होता है। डॉलर का रेट शामिल दोनों करेंसी के demand और supply से impacted होता है। अगर डॉलर की मांग अधिक है, तो डॉलर के रेट में तेजी होगी क्योंकि लोग 1 डॉलर खरीदने के लिए अधिक रुपये का खर्च करने को तैयार हैं। यदि रुपये की मांग अधिक है, तो डॉलर के रेट में कमी आएगी क्योंकि बहुत से लोग डॉलर के लिए बिजनेस नहीं करेंगे, इसलिए, डॉलर को अधिक lucrative/ attractive बनाने के लिए, इसकी कीमत कम हो जाएगी, जिससे हमें डॉलर कम रेट में मिलेगा।


डॉलर का रेट भारत में लोगों पर असर डालता है क्योंकि सभी import और export डॉलर करेंसी में किए जाते हैं। अगर डॉलर का रेट अधिक है, तो भारत के बिजनेस मैन को समान का payment करने के लिए अधिक रुपये खर्च करने होंगे। जब कोई बिजनेस मैन ऊंचे दाम पर समान पाएगा तो वो निश्चित रूप से इसे ऊंचे रेट पर ही बेचेगा। अंत में ऊंचे डॉलर के रेट के कारण भारतीय यूज़र्स के लिए सामान महंगा हो जाता है। ट्रेडिंग के अलावा, दूसरे कारण भी impact हो सकते हैं जैसे FDI, मुनाफा, ब्याज दर आदि।


रुपए में गिरावट का कारण


ग्लोबल मार्केट्स में कच्चे तेल की बढ़ती कीमत इसका एक कारण है। नवंबर 2014 के बाद पहली बार अमेरिकी तेल 70 डॉलर प्रति बैरल से अधिक हो गया था, क्योंकि ट्रेडर्स ने ईरान पर प्रतिबंधों को फिर से लागू करने के लिए दृढ़ता दिखाई। भारत उपयोग करने के लिए लगभग 80 प्रतिशत तेल का आयात करता है, जिसका सीधा असर रुपए पर होता है।


ये कैसे खराब है?


डॉलर के मुकाबले कमजोर रुपया इंपोट को महंगा बनाता है। कुछ imports में कटौती नहीं की जा सकती है। जैसे कि तेल, जो कि भारत के वर्तमान अकाउंट deficit पर negatively असर डाल सकता है। एक vicious cycle में, एक depreciated रुपया भारत के मुख्य import के बाद, तेल को और महंगा बनाता है। महंगे तेल का मतलब है केवल तेल का मंहगा होना नहीं होता है। बता दें, उसके बाद सब्जियां, किराने का सामान आदि की कोस्ट बढ़ जाती है। यदि भारतीय पेट्रोलियम मंत्री पेट्रोल खरीदने मध्य पूर्व के देश जाता है, वहां के तेल विक्रेता पेट्रोल के बदले डॉलर की मांग करेगा पर भारत के पास डॉलर नहीं है। हमारे पास भारतीय रुपया है तब भारतीय मंत्री अमेरिका से डॉलर देने को कहता है इस पर अमेरिका फेडरल रिजर्व एक कोरा कागज लेकर डॉलर छापकर उसे देगा अतः हम डॉलर पाकर उसे पेट्रोल विक्रेता देकर पेट्रोल खरीदते हैं|


निष्कर्ष


साल 1913 में 1 डॉलर की कीमत 0.09 पैसे थी। वहीं, आज के समय में 1 डॉलर की कीमत 79.08 रुपए हो गई है। अब आप खुद सोचिए भारत वृद्धि की ओर बढ़ रहा है या फिर महंगाई की ओर बढ़ रहा है।

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