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होलिका दहन पर निबंध

होलिका दहन पर निबंध
Hindi Essay on Holika Dahan

प्रस्तावना:- यो तो हमारे देश मे विभिन्न प्रकार के पर्व त्योहार मनाए जाते है। सभी पर्व और त्योहारो के अपने -अपने महत्व और आकर्षण है। इस प्रकार के आकर्षक और महत्वपूर्ण त्योहार में दशहरा, दीवाली, रक्षाबंधन, रामनवमीं, आदि उल्लेखनीय है। होली का त्योहार भी एक ऐसा ही उल्लेखनीय त्योहार है।

कब मनाया जाता है:- यह भी हम भलीभाँति जानते- समझते है। कि हमारे देश के पर्व और त्योहार किसी न किसी ऋतु या पौराणिक कथा से अवश्य सम्बंधित होते है। होली के त्योहार पर्व के विषय दो बातें स्पष्ट से कही जा सकती है। पहली बात यह कि यह की यह त्योहार पर्व ऋतु से समन्धित है। शरद ऋतु की समाप्ति ओर ग्रीष्म ऋतु शुरू होने के मध्य का जो समय होता है। उसमें होली का त्योहार मनाया जाता है। इसे ऐसे भी कह सकते है। कि इसे फाल्गुन पूर्णिमा को मनाया जाता है। यह मान्यता है कि देवता को बिना भोग लगाएं कोई वस्तु उपयोग में नहीं लायी जानी चाहिए। इस समय की फसल पक कर तैयार हो जाती है। इस लिए इस दिन बने अन्न को देवता को समर्पित किया जाता है। दूसरे शब्दो मे अन्न को अग्नि में डाला जाता है। अन्न की आहुति दी जाती है। संस्कृत में अन्न को “होलक” ओर हिंदी में होला कहते है जो कि होलिका दहन से शुरू हो जाता है। इसी आधार पर इस पर्व का नाम होली पड़ा। इसी दिन लोग अन्न की आहुति देकर अन्न का प्रसाद एक दुसरे को देकर बड़ी खुशी से गले मिलते हैं।

होली मनाने की पौराणिक कथा:- होली मनाने के विषय में एक पौराणिक कथा है, कहा जाता है कि प्राचीनकाल में हिरण्यकश्यप नामक अत्याचारी , दुराचारी ओर निरंकुश राजा का शासक था। उसने अपने शासक काल मे निरंकुशता को इतना बढ़ा दिया था, कि उससे सारी प्रजा कांप उठती थी। वह प्रजा को अपनी बात मनवाने के लिए विवश करने लगा था। उसने स्वयं को ही भगवान मान लिया । अपनी सारी प्रजा को भी उसे भगवान के रूप में पूजने ओर मानने के लिए कठोरता पूर्वक दंड दिया करता था। उसके ऐसा करने पर उसका पुत्र प्रहलाद उसका विरोध करता था। क्योंकि प्रहलाद परमेश्वर ओर ब्रह्मा जी का बहुत बड़ा उपासक था, उनकी ही उपासना करता था। उसे इस तरह देख कर हिरण्यकश्यप आग बबूला हो जाया करता था।

अपने पुत्र प्रहलाद को अपना परम् विरोधी समझकर हिरण्यकश्यप ने उसे कई प्रकार की यातनाओं से प्रताड़ित किया। उसने जब यह देखा कि प्रहलाद पर किसी भी प्रकार की यातनाओं से उसकी भगवान ब्रहमा जी की उपासना से मन समाप्त नही हो रहा है। तब उसने अपनी बहन होलिका को यह आदेश दिया कि प्रहलाद को लेकर आग में बैठ जाए। जिससे वह जलकर भस्म हो जाये। ऐसा इसलिए कि होलिका को यह वरदान मिला था कि आग उसका कुछ नही बिगाड़ सकती है। वही हुआ भी। होलिका प्रहलाद को लेकर आग में बैठ गयी। लेकिन प्रहलाद की परम भक्ति ने प्रहलाद को बचा लिया । आग से प्रहलाद का कुछ भी बाल-बांका न कर सकी ओर होलिका को ही जलाकर भस्म कर दिया।

होलिका के बुरे कर्मो ओर प्रहलाद की अटल भक्ति – भावना की याद में फाल्गुन पूर्णिमा की रात को लोग होलिका दहन करते है। होलिका दहन करते समय वे बड़े आनन्द ओर उत्साह मग्न दिखाई देते है। इस अवसर युवाओं का उत्साह बड़ा ही अद्भुत दिखाई देता है। उन्हें देख कर ऐसा लगता है। उन्होंने कोई निजी शत्रु का दहन करना है। इससे सारा वातावरण उल्लास से भरा हुआ दिखाई देने लगता है।

होलिका दहन के दुसरे दिन:- होलिका दहन के दुसरे दीन दुल्हण्डी मनाई जाती है। इस दिन सभी स्त्री-पुरुष , बच्चे सुबह से दोपहर तक एक दुसरे पर रंग गुलाल अबीर पानी आदि डालते है। इससे सारा वातावरण विभिन्न प्रकार रंगमंच दृश्यों में बदल जाता है। फिर दुश्मनी को दोष्टि में बदलने में ज्यादा समय नही लगता इस त्योहार में रंगों की पिचकारियों जब एक दुसरे पर रंगों की वर्षा करने लगती है, तो उस समय ऐसा लगता है, मानो रंगों की कभी न समाप्त होने वाली झड़ी लग गयी है।

उपसंहार:- इस प्रकार होली का त्योहार दुश्मनी को खत्म करके दोस्ती में बदल जाने का नाम है। ओर होलिका दहन भी हमे ये सिखाती है कि सारे बुरे कर्मो को होलिका की अग्नि में दहन करके अच्छे कर्मों को अपनाना जिस प्रकार होलिका जैसी बुराई प्रहलाद को अग्नि में नही जला पाई अपितु उसका खुद का अंत हो गया इसलिए हमें भी सभी प्रकार की बुराई को अग्नि में स्वाहा करके अच्छे कर्मों को प्रहलाद की भांति अपनाना चाहिए।

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